Wednesday, March 14, 2007

कहां समझता है कोई....


मैं समझता हूं तुम्हें....

शामिल हूं तुम में हमेशा..

हर बार कहता रहा वो...

पर जब भी खामोशियों को...

सुनने का वक्त आया....

धङकन भी कहां सुन सका कोई....

कहने को सब कह देते हैं, पर..

दिल की जुबां कहां समझता है कोई....


तुम्हारे दर्द का एहसास है मुझे...

महसूस करता हूं तुम्हें हमेशा...

हर बार जताता रहा वो...

पर जब भी ज़ख्मों को...

सहने का वक्त आया....

जरा सा भी दर्द कहां सका कोई...

कहने को सब कह देते हैं, पर...

पर किसी का दर्द कहां सहता है कोई....


मैं थाम लूंगा तुम्हें...

साथ हूं तुम्हारे हमेशा...

हर बार यकीं दिलाता रहा वो...

पर जब भी तन्हाईयों में....

साथ देने का वक्त आया...

दो कदम भी कहां...

साथ चल सका कोई...

कहने को सब कह देते हैं, पर...

उम्र भर कहां साथ चलता है कोई....

5 comments:

aditi nandan said...

kahin kuch khass chipa rakha hai, per ummed byan karti hai ki, kuch baat chupa rakha hai,na kar afshosh ye dost mere, khushi ko aane de bahar, jise ab tak bacha rakha hai...

bhupen said...

पढ़कर कुछ देर सोचता रहा. लिखती रहा करें.

raj said...

the first one shayad tumne ghar badal liya written nicely about immatured aspiring love in very young stage of life. It is dipicting the hope of getting maturity of love but in vein.
hwever very simple hindi used and having excellant way of expressing the feelings at young stage.

Anonymous said...

Baitha tha aankhe moond kar..na jane woh kya khyal tha ....viran tha mera gulistan ...main pareshan sa...uljha tha zindgi ki uljhnon me...na jane kiska intzar tha....ke tabhi....chham se.. meri zidagi me koi dost ban kar aai..jaise subhah ki kirne...andheri rat ke baad...aangan me athkheliyan karne aai...tere shabdon ne mere jeevan ko sawaran hai...kya likhu main tere likhne ki tarif me..tune to tarif shabd ko hi apni kavita me utara hai.

kiran solanki

Rachna Singh said...

very true and realistic