मेरे श्याम-सांवरे !!!!

मेरे श्याम-सांवरे !!!!
अंतर क्या दोनों की चाह में बोलो...

Saturday, August 29, 2009

खोया सा.. एक रिश्ता..


एक रिश्ता तेरा - मेरा.......
एक रिश्ता कुछ पूरा.... कुछ अधूरा......
कुछ तुम सा... कुछ मुझ सा...
एक रिश्ता... हम सा....
यादों के नर्म लिहाफ़ में लिपटा....
तेरी मेरी उंगलियों में उलझा...
कभी सुबह की करवटों में.....
कभी शाम के झुरमुटों से...
हर कोने से पुकारता... एक रिश्ता..
मेरी गोद में मुंह छिपाए....
तेरे कांधे पे सर को झुकाये....
सिसकता है रिश्ता.....
मुझ से हाथ छुड़ा तेरे पीछे....
साये सा चला है.. रिश्ता...
तुम्हें रोकता... मुझे बुलाता...
चलते - चलते रुका सा रिश्ता....
बढती दूरियों में... खोया सा...
सन्नाटे में गुम .. सदाओं सा...
ना तुममें शामिल... ना मुझमें...
अब अकेला चला है रिश्ता...
थकी - थकी सी सांसें लेता....
बंद पलकें किये... सोया है रिश्ता.....

Sunday, August 9, 2009

कहो ना...

क्या सुनाई देती है.... तुम्हें मेरी आवाज़ आज भी...
कहीं हवा में घुली- घुली सी....
जब गुजरते हो तुम... यादों के गलियारे से..
क्या मेरी परछांईयां... तुम्हें वहां आज भी मिलती है...
कहो ना... क्या आज भी शामिल है कहीं..
मेरा संग तुम्हारी राह में.....

क्या अब भी... मेरी आंखें रोकती है...
तुम्हारे बढ़ते कदम... और लौट पड़ते हो तुम....
फिर मेरी ही ओर....
सुनो तुम सच कहना.... अब भी डरते हो...
उन घनी पलकों से......

क्या अब भी सुनते हो तुम.. मेरी खामोशी...
मेरा डांटना... तुम्हारा डरना....
क्या सचमुच... एक ख्वाब था...शीशे का...
देखो ना गिरा है एक टुकड़ा...
मेरी पलकों से... चुभता है मेरे पांव में...
क्या अब भी दर्द होता है तुम्हें.... मेरे दर्द से..

क्या अनछूआ सा वो रिश्ता..
अब भी छूता है तुम्हें...
अब भी थामता है हाथ तुम्हारा... करता है जिद तुमसे..
क्या अब भी वजूद मेरा शामिल है.. तुम्हारी रूह में...

क्या लौटोगे तुम फ़िर कभी.....
लौटाने को दिन नये... रिश्ते पुराने.....
क्या कभी याद आयेंगे.... तुम्हें गुजरे ज़माने....
कहो ना..क्या अब भी मेरे ख्वाब रखे हैं.. तुम्हारे सिरहाने..

Wednesday, June 24, 2009

Dard..............


जाने कैसा दर्द है... की मुझे दर्द का एह्सास नहीं..
जले ज़ख्मों पे नमक कौन छिड़कता है...
जिस्म छिलने से मुझे कहां दर्द होता है...
मेरे रिसते जख्मों को मरहम की तलाश नहीं....


सूनी वीरान आंखें... अब बंजर हो चली हैं..
होने दो अब दर्द की बारिश....
ज़िंदा रहने को समंदर भी अब कम पड़ता है...
मुझे मीठी झील की प्यास नहीं....

मेरी समझ उसे कभी समझ ना सकी...
ना उसने मुझे समझा कभी...
हाथ में सवालों के पत्थर उठाये खड़ा है आईना...
ये अक्स मेरा है... पर इसे मेरी पहचान नहीं...


दर्द को हथेली में बंद कर जो छिपा लिया मैंने...
मेरी तकदीर की लकीरों में अब मुस्कान नहीं...

Saturday, January 3, 2009

जाने कैसे हो तुम...........


सोचती हूं तुम्हें.... की कैसे हो तुम....



अजीब सवाल है न...




जब तुम्हें महसूस करती हूं....




एक अजीब सा सुकून.....




एक अजीब सी कशिश....




दौड़ती है... मेरी रगों में.....




लगता है क्या मेरे दिल में...




बसे अहसासों जैसे हो तुम.....




जाने कैसे हो तुम........







सांवली रात... गोरी चांदनी....




झिलमिल तारे... और मदहोश हवा....




सब छूते हैं मुझे...




बातें करते हैं मुझसे....




तुम्हारी महक... तुम्हारी सदा...




मुझे समेट लेती हैं....




और जब बोझल पलकें...




नींद के आगोश में.. सोती हैं..



्सोचती हूं क्या ख्वाबों जैसे हो तुम....




जाने कैसे हो तुम............





रब की सूरत.. बंदे का सजदा...



बंद आंखों... जुड़े हाथों की....



खामोश प्रार्थना.....



इनमें बसते हो तुम....



जब भी हाथ उठा आंखें बंद की....



लगता है दुआओं जैसे हो तुम.....



जाने कैसे हो तुम..........





Friday, December 19, 2008

मेरी जान भी बस वहीं से रूखसत होती है.....


यूं किसी चीज़ से डर लगता नहीं मुझको..

बस एक तेरी नज़रों से दहशत होती है...


किसी और की ख्वाहिश अब नहीं मुझको..

पर जाने क्यों तुझसे मोहब्बत होती है...


सारे जिस्म को मेरे अब कोई एह्सास होता नहीं...

लेकिन तेरे नाम से दिल में अब भी हरकत होती है...


मैंने तो कई बार की अपनी मौत की दुआ...

जाने किसकी दुआ से मेरी उम्र में बरकत होती है...


जहां से तुम ने कह दिया अलविदा....

मेरी जान भी बस वहीं से रुखसत होती है...



इंसानी लहू की चाह सिर्फ़ जानवर को ही नहीं..

यकीं मानो इंसानों में भी एसी वहशत होती है...

Monday, December 1, 2008

मैं भी अब जीना जानती हूं.....


एक लड़्की ..हूं मैं... बंधनों से बंधी हूं...

जन्म से ही... बेटी..बहन.... ये सुन-सुन बड़ी हुई..

राखी के बंधन बांधे मैंने.....

पर जाने कितने बंधनों में मै जकड़ी गई....

ईज्ज्त... आबरू.... हया..शर्म.....

जाने कितने परदों से मुझे ढका गया......

बाली.... झुमके..चूडियां.... पायल.....

इन जेवरों से.. उन परदों को कसा गया....

काजल....बिंदिया.... लाली....

इन सबसे....

मेरी आंखों... मेरे होठों पर बंधन लगाये गये.....

नीची नज़रों.. कांपते होठों... लंबे बालों...

में मेरा रूप निहारा गया......

यौवन ने गालों को.... और सुर्ख किया...

परदों को और जकड़ा गया....

सात परदो से ढके बदन को...

जाने कैसे सबने जान लिया...

कविताओं.. शेरों ... तस्वीरों..

जाने कहां -कहां.....

कभी स्याही.. कभी रंगों से....

मेरा अक्स उतारा गया.........

धीमी सदा की तारीफ़ हुई......

अश्कों से आंखें और हसीन बनीं....

डर लगा उन्हें और ज्यादा........

तो सिंदूर... मंगलसूत्र.... अंगूठी..... मेंहंदी...

नये सिंगार .. नये जेवरों से...

सात जन्मों के नये बंधन से.....

मुझे फ़िर बांधा गया......

पत्नी.. बहू..मां........

नये नामों से फ़िर जकड़ा गया....



अब दम घुटने लगा है...

इन परदों... इन बंधनों में..

एक सांस अपनी ...

खुले आसमां के तले...

चाहती हूं.......

अब किसी के लिये नहीं.....

बस खुद को जीना चाह्ती हूं.....

सिंगार सारे छोड़ दिये....

सारे जेवर तोड़ दिये.......

इस बोझ को उतार फ़ेंका है मैने....

अब कमर सीधी कर चलना चाह्ती हूं....

खुली आंखें... खुली आवाज़.....

मेरी पह्चान बने अब.....

मैं भी अब जीना जानती हूं..............










Sunday, October 26, 2008

बारिश.... अजीब सी....




कई दिनों बाद आज फ़िर बारिश हो रही है..... काले घनघोर बादल छाये हुये हैं.... और अनवरत हो रही है बारिश.... बहुत तेज नहीं... पर बहुत मद्धम भी नहीं.....


यूं तो मुझे बारिश बेहद पसंद है.... बारिश होते ही.... मेरा मन करता भींग जाउं... आसमान से गिरती बूंदों को देख्ना.. उन्हें हाथ में लेना.. बेहद पसंद है मुझे.... हल्की हल्की बारिश में चलना.. बहुत भला लगता है मुझे........


पर जाने क्यूं आज ये बारिश......... मुझे अच्छी नहीं लग रही... मानो... कुछ अजीब सी है ये बारिश... किसी अवसाद में घिरे हैं ये बादल... और यूं इसका थोड़ा धीरे बरसना.... छुपकर चुपअचाप रोने सा मालूम होता है मुझे....... आज बारिश में भीगने को भी जी नहीं चाहता.... बल्कि इस बारिश से मेरा मन भीगा जा रहा है... पलकें जाने - अनजाने चुपके से गीली हो जाती हैं.... भागते हुये बादल यूं लगते हैं जैसे.. कोई सब कुछ छोड़ कर कहीं भागा जा रहा हो.. सारी दुनिया से...




बारिश सुबह से ही हो रही है... सब कुछ भीग रहा है... हल्की ठंड भी हो रही है... पर जाने क्यूं मेरा तन-मन इस ठंडक को अपने भीतर नहीं महसूस कर पा रहा है.... मन तरस रहा है अब भी शीतलता को............ शाम हो आयी है.... पर स्याह बादलों की वजह से.. सिंदूरी लालिमा कहीं नज़र नहीं आती.... ये तो स्याह शाम है... एक स्याह शाम.... और यूं भी आज तो वक्त के पहले ही अंधेरा हो गया है... और बढता ही जाता है... भींगा अंधेरा.. घना स्याह अंधेरा....... शायद भींगे कंबल जैसा......... जिसे ओढने से क्या भला.. ठंड दूर होगी ?........ और ना चुभेगा वो ??...........




अंधेरे में ये बादल कुछ अजीब से लग रहे हैं मुझे.... इनकी सफ़ेदी अजीब सी है.. कुछ भुतहा सी.....शायद इनको देखते देखते डर भी लगता है कहीं .. भीतर ही भीतर.. और मैं झट से... नज़रें नीची कर लेती हूं.....


आज ये घने-गहरे बादल मुझे अच्छे नहीं लगते.. वरन डराते भी हैं मुझे.... कहीं बारिश इतनी तेज तो न होगी... की सब बह जायेगा...... डूब जायेगा..... ?




नहीं नहीं ऐसा नहीं होगा..... ये धीमी.. अजब सी बारिश.... इसे थमना ही होगा.. नहीं तो लगता है मेरा दम घुट जायेगा........ जैसे सांस नहीं ले पाउंगी.... मुझे खुला आकाश चाहिये..... नीला -चमकीला.... उष्ण धूप की चाहिये मुझे..... खुली हवा.. चमकीले तारे ..... चांदनी रात...... ये चाहता है मेरा मन.... जानती हूं बादल छंट जायेंगे..... इन्हें मुझे मेरा आकाश लौटाना ही होगा....... आज मुझे इनकी चाह नहीं....... मुझे अब धुली-खुली... सुंदर.... वसुंधरा की चाह है... वो भी नीले आसमां तले...........