Wednesday, March 7, 2007

हां नारी हूं मैं.. पर क्या है मेरा स्वरूप...







हर रोज़ ये सोचती हूं कि कौन हूं मैं.. क्या पहचान है मेरी..कभी सोचती हूं की प्रेम-विरह की राहों में उलझी नायिका हूं.. तो कभी लगता है सपनीली आंखों वाली नवयौवना हूं...कभी खुद को घर संभालती गृहिणी पाती हूं.. तो कभी दौङ-भाग करती,दफ़्तर जाती आधुनिका... कभी उस पत्थर तौङती,ईंट ढोती मजदूरिन में खुद को पाती हूं... कभी वो कपङॆ धोती,बरतन धोती भी मुझ जैसी लगती है... कभी उस पानी भरती पनिहारिन.. उस चूङी बेचती मनिहारिन... सबमें अपना ही स्वरूप देखती हूं.....

फ़िर लगता है नहीं इन सबसे बढकर पहले एक नारी हूं मैं.. नारी 'शक्ति सृजन की, तो शक्ति विध्वंस की भी'... दुर्गा का रूप हूं.. अंबा भी... रूप मुझमें काली और चंडिका का भी.... जीवनदायिनी मां का स्वरूप हूं... 'कौशल्या और यशोदा' भी मुझमें... जन्म दिया 'राम-कृष्ण' को मैंने.... तो 'कैकसी' का भी रूप मुझमें.. 'रावण' भी पनपा था मुझसे... प्रेयसी-प्रेमिका हूं 'अल्हङ राधा सी'.... तो रूप मुझमें रति का, रंभा का भी... 'सीता-सावित्री' बन धर्म निभाया मैंने... तो 'द्रौपदी, बन नींव डाली 'महाभारत' की..... रणभूमि में भी उतरी हूं तलवार लेकर.. संभाला है देश भी... हिमालय तक जा पहूंची हूं.... नापा है अंतरिक्ष भी.... खेल सकती हूं सागर से.. छू सकती हूं आकाश भी...

पर कौन समझा है मेरे इन रूपों को, मेरी इस शक्ति को... शायद स्वयं मैं भी नहीं... ये सत्य नहीं इस देश की आधी आबादी का... बस एक आवरण है मेरी वासत्विकता का.. मुझे पूजनीय कहा जाता रहा.. मूरत बना मंदिरों में बिठाया गया... पर क्या मैं सचमुच पूजी गई?.......

आज भी गर्भ में मेरी आहट या मेरा जन्म विचलित कर देता है मेरे जनक को... आज भी घिरी हूं अशिक्षा के अंधकार से.... जाने कितनी बार जली हूं अग्नि में जीवित या जलायी गई .. कभी 'दहेज की बलि वेदी' पर कभी 'सती' बनाकर... बस सौदर्य की उपमा या भोग की वस्तु ही माना गया मुझे.... तस्वीरों में उकेरी मेरी देह की कलाकृतियाओं पर मंत्रमुग्ध हैं सब... पर जब भी मैने अपने अस्तित्व के लिये नियम तोङे मेरे चरित्र पर सवाल उठाया गया... मेरी तस्वीरों का ModernArt पसंद है .. मेरा पाश्चात्यानुकरण अश्लील माना गया....आज भी बाज़ार गर्म है मेरी देह के क्रय-विक्रय का...



मुझे प्राथमिकता मिली केवल बस की सीटों या रेल की टिकट की कतार में या केवल 'कर-बचत' में नहीं... अपहरण,ब्लात्कार,शोषण, उत्पीङन इनमें भी प्राथमिकता प्राप्त है मुझे...


कब तक आखिर कब तक चलता रहेगा ये सब..? कब मुझे अपनी पहचान मिलेगी.. कब बरसों से दबे-कुचले अपने अस्तित्व को तलाश पाउंगी...कब 'शक्ति' बन 'शिव' के समान जी पाउंगी.. और कब तुम समझोगे मुझे...?

11 comments:

Divine India said...

तुम्हारा यह लेख Feminist विचारधारा को शायद पूरी तरह से पोषित नहीं करती हो…पर कही-न-कही दिखना तो है ही…। मैं मात्र यही कहना चाहूँगा की नारी की नीजता पूर्ण नारी होने में है ना की अनुकरणीक नारी में…। यहाँ हर स्तर पर जागरुकता लाने की आवश्यकता है…और ज्यादा भार तुम जैसी नारियों पर है मगर नहीं; वहाँ भी पुरुष की आवश्यकता पड़ेगी तो किस स्वतंत्रता की बात हो रही है। 100 मकानों का Red Light Area है दिल्ली जैसे शहर में और शायद महिलाओं का संगठन भी उससे कम नहीं होगा साथ में महिला वीर सोनिया गाँधी-किरण वेदी पर यह छोटा सा इलाका भी समाप्त नहीं किया जा सका…क्या इसके जिम्मेदार मात्र पुरुष है? लगातार बढ़ते बड़े घरों के Call Girls मात्र जीवन को ऐश से जिने के लिए अपना तन बेचते है यानि आज लज्जा की कोई किमत नहीं,"आने बाले 50 सालों में शायद यह हुकूमत महिलाओं के हाथों में हो लेकिन यह मेरी भविष्य वाणी है वह समाज सबसे ज्यादा अराजक होगा."

उडन तश्तरी said...

अरे, आज तो विश्व महिला दिवस है, आप ही आप. फिर यह कैसी विचारधारा से घिर गईं इस पावन दिवस पर??

manya said...

divyabh... yahaan maine kisi bhi wichaardhara ka poshan karne ki koshiah nahi ki hai.. na hi naari-sarthan ke naam par sahanubhooti ikaathi karani hai.. ye ek koshish hai swayam naari ko uski shakti ki pehchaan karaane ki.. shakti jisme maine positive aur Negative dono pahlu dikhaaye hain.. main chaahati hun wo khud ko pehchaane.. tabhi kaha 'shayad swayam main bhi nahi samajh paayi...'
Rahi baat naari ki stithi ki uske liye kahin bhi kewal purush warg ko dosh nahi diya hai.. balki poore sammaj par sawaal hai.. aur isme naariyan bhi shaamil hai.. kai kuprathaaon ko hum naariyon ne hi prashray diya hai... to kai mein purush warg ka bhi haath hai.. ye ek aahwaahan hai naari ko jaagrook karne ka.. kyunki hum khud apni izzat na kare koi nhai karega .. yemera maananaa hai...
Naari jaagrukataa ka daaromdaar swayam hum par hai maanati hun.. par kuchh ummedd aap jaise nawyuvakon se bhi thi.. main swayam apni pahchaan banaa sakti hun.. par jyaadatar naariyon ko jaroorat hai ek chhote se sahaare ki.. wo haath mere saath aap bhi badhaate to achchha lagta.. par aap to kinaara kar gaye.. uar bhawisywaani bhi kar daali.. jisse main katai sahmat nahi... 50 saal baad kya hoga nahi jaanati.. par aaj yahi chaahati hun naari jaage apni pehchaan talaashe aur ye samaaj bhi badale tabhi har star par vikaas hoga...
Chand pragatisheel mahilaon se poore desh ki naariyon ka sach nahi kaha ja sakta... purnroopen kraanti aawashyak hai...
aur haan.. Tan Naari ne bechaa Kharida kisne?.. kyun nahi ek baar koshish ki Seene se dhale aanchal ko waapas uthaane ki.. kyun nazaren jhukaai nahi.. ek baar bhi aisa karte to doobara kabhi wo aanchal nahi girtaa khair...
Aap sabse yahi nivedan hai ye naari warg ke liye bhi hai,purushon par doshaaropan nahi...

manya said...

Sameer Ji aaj hi to aawshyakta hai aise wichaaron ki...

Beji said...

अस्तित्व की तलाश करते कुछ विचार....आगे सोचने को मजबूर करते हैं....अच्छी लगी यह पोस्ट !!

Manish said...

मान्या सही प्रश्न उठाए हैं आपने जो आज के हालातों में हमारे समाज के एक अहम हिस्से की दशा और दिशा के बारे में सोचने को मजबूर करते हैं । बेहतरीन पोस्ट !

Divine India said...

Manya,
bas yahi hai kuntha...jo najar aa rahaa hai...!!! kharid-bikari ki niyati dusari hai...koi is jagat me sanyaasi nahi hai...agar aisaa hotaa to shayad...parmatama khoj liya gaya hota...itani Philosophy ki kitaben likhane ki jaroorat nahi thi,tark vikas ka suchak nahi hai...agar hanth na bataayaa hotaa to mai yah kahataa hi nahi...maine dekhaa hai vastavikta kya hai...aur mai tumahari lekh ko puri tarah samajha hai...iss kaaran puraa Feminist nahi kahaa...rahi bhavishwaani ki to yah samaj jo aab dhire-dhire nari uthan manch banataa jaa rahaa hai iski parinati matr abdharnaao me hi hogi... corruption power se aataa hai aur yah aab dikhta hai...
yah maatr nari ke saath ki gayi kuritiyaan nahi hai yah saamaajik kuritiyaan hai jo door ho rahi hai...yahaan Delhi me shayaad hi kisi ko nari manch ki aavsayaktaayen hai...woh to puri tarah se carrier ke liye kuch bhi me viswash karti hai...Nari ko Kisi sawarup ko talash karne ki jaroorat nahi hai... Nari Swaem Me Ek Puri Dharnaa Hai jise jaanane ki awasakata hai...Thnx.

गिरीन्द्र नाथ झा said...

आगे इतना कुछ पढ चुका हूं कि मै कुछ भी लिखने के लिए तैयार नही हूं..
आखिर यही तो सच्चाई है..फिर मुंह क्यों मोड्ना पर रहा है..लेकिन समाज में बदलाव तो आयेगा हीं मान्या जी....बस कदम बढाते रहें-----
girindranath@gmail.com

उन्मुक्त said...

'कब 'शक्ति' बन 'शिव' के समान जी पाउंगी.. और कब तुम समझोगे मुझे...?'
शायद यह तभी होगा जब नारी दुर्गा का रूप लेगी।

Jitendra Chaudhary said...

मुझे प्राथमिकता मिली केवल बस की सीटों या रेल की टिकट की कतार में या केवल 'कर-बचत' में नहीं... अपहरण,ब्लात्कार,शोषण, उत्पीङन इनमें भी प्राथमिकता प्राप्त है मुझे...

युग बदलेगा, हम बदलेंगे और बदलेगा समाज।
समय आ रहा है, चिन्ता नही चिन्तन करो।

जहाँ तक मै देख रहा हूँ, जिस हिसाब से कन्या भ्रूण हत्याएं हो रही है, उसके हिसाब से आने वाले समय मे लड़कियों की भारी कमी हो जाएगी। ये एक सामाजिक समस्या हो जाएगी।

एक अच्छा लेख। आप तो गद्य भी अच्छा लिखती है, गद्य और कविताओं का अनुपात बराबर रखिए।

manya said...

बेजी जी, मनीष जी, गिरीन्द्र जी, उन्मुक्तजी और जीतू जी बहुत शुक्रिया जो इत ना सराहा.. यूं ही हौसलाअफ़्जाही करते रहें..