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Thursday, February 11, 2010

’अमर्यादित’...


बस देह से देह के घर्षण से...
कोई अपवित्र नहीं हो जाता...
यूं लुट नहीं जाती ’इज्जत’ किसी की..
यूं नहीं हो जाता कोई ’अमर्यादित’...
तुमने किसी ’मर्यादा’ का उल्लंघन किया नहीं...
तुमने नहीं किया किसी सीमा का अतिक्रमण...
सीमा लांघी हैं... किसी और ने अपनी मर्यादाओं की...
उसी ने जगाया है... खुद में सोये शैतान को...
इससे तुम नहीं हुई कलुषित... कलंकित...
’इज्ज्त’ का संबंध तुम्हारी देह से नहीं..
तुम्हारी आत्मा से है....
ना तुम अपराधी... ना तुम्हारा कोई दोष है...
तुम ना सर झुकाओ .. ना नजरें चुराओ...
’बलात्कार’ ... ये शब्द तुम्हारे नहीं...
इस ’समाज के माथे का कलंक’ है....
तुम कल भी हमारी थी...
तुम आज भी अपनी हो..
तुम सर उठाओ.... आगे बढ़ो....
उन वहशी.... दरिंदों को सजा दिलाओ..
यही तुम्हारा हक है...
तुम नारी नहीं नारायणी बनो...
त्रिशूल थाम साह्स का....
नेत्र खोल अपने प्रतिघात का...
महिषासुर मर्दिनी बनो....
इज्जत अगर नहीं होती...
तो वो नहीं होती...
ऐसे... मानवरूपी दानवों को...
तुम्हारा तो सिर्फ़... शरीर..
क्षतिग्रस्त होता है....
इन घावों को भरने दो तुम....
कुरेदों जड़ें... इन विष-बेलों की....
उखाड़ फेंकों इन्हें...
तुम जीओ... जीना मुश्किल कर दो उनका...
उम्मीद है... ऐसा कर पाओ तुम..
इस समाज के दोहरे मापदंडों से...
ना डरो तुम...
साथ तुम्हारा... देंगे हम.....
क्यूंकि अपनी - अपनी आत्मा को...
हमें स्वयं 'मर्यादित' रखना है...

Monday, December 1, 2008

मैं भी अब जीना जानती हूं.....


एक लड़्की ..हूं मैं... बंधनों से बंधी हूं...

जन्म से ही... बेटी..बहन.... ये सुन-सुन बड़ी हुई..

राखी के बंधन बांधे मैंने.....

पर जाने कितने बंधनों में मै जकड़ी गई....

ईज्ज्त... आबरू.... हया..शर्म.....

जाने कितने परदों से मुझे ढका गया......

बाली.... झुमके..चूडियां.... पायल.....

इन जेवरों से.. उन परदों को कसा गया....

काजल....बिंदिया.... लाली....

इन सबसे....

मेरी आंखों... मेरे होठों पर बंधन लगाये गये.....

नीची नज़रों.. कांपते होठों... लंबे बालों...

में मेरा रूप निहारा गया......

यौवन ने गालों को.... और सुर्ख किया...

परदों को और जकड़ा गया....

सात परदो से ढके बदन को...

जाने कैसे सबने जान लिया...

कविताओं.. शेरों ... तस्वीरों..

जाने कहां -कहां.....

कभी स्याही.. कभी रंगों से....

मेरा अक्स उतारा गया.........

धीमी सदा की तारीफ़ हुई......

अश्कों से आंखें और हसीन बनीं....

डर लगा उन्हें और ज्यादा........

तो सिंदूर... मंगलसूत्र.... अंगूठी..... मेंहंदी...

नये सिंगार .. नये जेवरों से...

सात जन्मों के नये बंधन से.....

मुझे फ़िर बांधा गया......

पत्नी.. बहू..मां........

नये नामों से फ़िर जकड़ा गया....



अब दम घुटने लगा है...

इन परदों... इन बंधनों में..

एक सांस अपनी ...

खुले आसमां के तले...

चाहती हूं.......

अब किसी के लिये नहीं.....

बस खुद को जीना चाह्ती हूं.....

सिंगार सारे छोड़ दिये....

सारे जेवर तोड़ दिये.......

इस बोझ को उतार फ़ेंका है मैने....

अब कमर सीधी कर चलना चाह्ती हूं....

खुली आंखें... खुली आवाज़.....

मेरी पह्चान बने अब.....

मैं भी अब जीना जानती हूं..............










Wednesday, August 1, 2007

हां वो एक वेश्या है...... और तुम????


तुम उसे 'वेश्या' कहते हो...



क्योंकि उसने बेची है..अपनी देह..



अलग-अलग लोगों के साथ..



हर बार संबंध बनाये हैं उसने...



उसे हक नहीं समाज में..रहने का..



सम्मानित कहलाने का..



वो अलग है..तुम्हारी बहू-बेटियों से..



क्योंकि वो जैसे जीती है...



वो जीवन नरक है...



वो जो करती है...



वो पाप है...



उसे भूखों मर जाना था...



खुद को मिटा देना था..



पर खुद को बेचना नहीं था..



है.. ना?



पर एक बात कहो..



उन्हें क्या कहोगे तुम....



जिनकी रातें गुजरती हैं..



रोज़ एक नयी देह के साथ..



जिनके घर में पत्नियां भी हैं..



और प्रेमिकायें भी...



जो बाप हैं बेटियों के..



और भाई भी हैं.. बहनों के..



पर फ़िर भी खरीदते हैं देह..



और अलग-अलग रंग तलाशते है..



क्या वो 'बाज़ारू' नहीं?????



सिर्फ़ इसलिये की...



उन्होंने 'देह' बेची नहीं..



खरीदी है.....???!!!!



Saturday, July 21, 2007

"बांझ कौन है ?"




शादी के दो वर्ष बीत गये....


और वो 'मां' नहीं बन पाई...


वंश को एक चिराग ना दे पाई....


आस-पड़ोस, नाते-रिश्तेदारों में....


कानाफ़ूसी,सुगबुगाहटें होने लगीं..


बांझ, निपूती, अपशकुनी जैसे..


अलंकारों से उसे नवाजा जाने लगा...


केवल ससुराल वालों ने ही नहीं...


अब तो 'सात जन्मों के साथी' ने भी...


उसे 'बांझ' कहना शुरु कर दिया था...


शब्दों की प्रताड़ना अब धीरे-धीरे...


शारीरिक यातना का रूप लेने लगी थी...


'एक बच्चा भी ना जन पाई' ये सवाल....


सबके होठों पर..और नज़रों में हिकारत...


सबकुछ उसकी आत्मा पर छ्प गया था...


पर 'वो' अब भी मौन साधे जी रही थी...


शायद यही मेरी नियति है..मान लिया था..


एक दिन पोते का मुंह देखने की लालसा में..


सास ने अपने बेटे की दूसरी शादी की बात की..


बाप बनने की ख्वाहिश में पति ने भी हामी भर दी..


सात जन्मों का साथ निभाने वाले ने...


तीन सालों में साथ छोड़ दिया था..और..


हुआ किसी और का सात जन्मों के लिये..


'वह' कब तक रहती अकेली निःसहाय...


उसने भी फ़िर से घर बसा लिया...


आज फ़िर दो और वर्ष बीत चुके हैं...


आज 'वह' एक बेटी की गौरवान्वित 'मां' है...


सुहागन, भागन जैसे अलंकार हैं....


और सुना है उसके पहले पति ने....


अपनी दूसरी बीवी को भी...


'बांझ' कहना शुरू कर दिया है....






Sunday, June 17, 2007

जिंदगी कुछ तो बता तेरा सच क्या है...


हंसते-मुस्कुराते चेहरों की खुशी में...

अचानक आंखों से पानी छलक आना..

बंद लबों में दर्द की लकीर का खिंच जाना...

कोमल चेहरे का अचानक सख्त हो जाना....

सपनीली आंखों में लहू का उतर आना...

इन बदलते मौसमों का मतलब क्या है..

जिंदगी कुछ तो बता तेरा सच क्या है...


थामे हुये हथेली से झटक कर हाथ छुड़ा लेना..

खुले हाथों की मुट्ठीयां भिंच जाना...

मिलते दिलों के सफ़र में अचानक पलट कर..

सीने में धोखे का खंजर चुभो देना....

इन बेगाने-बिखरते रिश्तों का मतलब क्या है...

जिंदगी कुछ तो बता तेरा सच क्या है...


पहले रोज़ बन के हमराह, हमसफ़र सा मिलना..

फ़िर एक दिन बनकर गैर नजर घुमा लेना....

रोज एक नयी राहगुजर से गुजरना .....

फ़िर भी मंजिल का ना मिलना...

इन अनजानी राहों का मतलब क्या है..

जिंदगी कुछ तो बता तेरा सच क्या है...


दिन भर कामों में उलझे रहना....

तरक्की के दौड़ में भाग-भाग कर थक जाना..

फ़िर भी आंखों में रातों को नींद ना आना..

मन में सुकून का ना होना....

इस बेचैनी का मतलब क्या है...

जिंदगी कुछ तो बता तेरा सच क्या है...


रोज़ एक नयी तलाश में घर से निकलना..

भीड़ में खुद को ढूंढने की कोशिश करना..

फ़िर हताश हो घर को लौट पड़ना....

अपने ही घर में मुसाफ़िरों सा रहना....

इन तन्हा चारदीवारीयों का मतलब क्या है..

जिंदगी कुछ तो बता तेरा सच क्या है.....


"जिंदगी कुछ तो बता ये तुझे क्या हो गया.."


Saturday, June 9, 2007

वो पागल औरत.....




सड़क पर चल रही..


वो पागल औरत...


दुर्भाग्य से जवान थी...


तन पर कपड़े...


कुछ कम थे उसके..


पर शर्म और समाज से...


वो अनजान थी...




अलग-अलग नज़रें ....


उसे कई भावों से..


देख रही थी....


कुछ को हुई वितृष्णा..


और उन्होनें...


घृणा से थूक दिया..


कुछ को शर्म आई..


और नज़रों को..


झुका लिया...


कुछ को दया आई..


पर किया कुछ नहीं..


उफ़! बेचारी... कहा..


और चेहरा घुमा लिया...


पर.....


कुछ आंखें अब भी....


उसी को घूर रही थी..


उसकी मलिन...


धूल-धूसरित देह में...


जाने क्या ढूंढ रही थी...






हा! ये कैसी कुण्ठित मानसिकता....


ये कैसी मानवता???...


एक दीन-हीन.. निर्बल..


असहाय... संग्या-हीन...


मानवी भी तुम्हें...


नज़र आती है...


महज एक देह..


बस एक भोग्या???!!!....




"कह्ते हो तुम उसे पागल.. उसे होश नहीं..


पर तुम चेतनावान मानव...


क्या किया तुमने....


किसे कहूं .. मैं पागल...


सोचती हूं.. किसे होश नहीं??!!"


Wednesday, March 7, 2007

हां नारी हूं मैं.. पर क्या है मेरा स्वरूप...







हर रोज़ ये सोचती हूं कि कौन हूं मैं.. क्या पहचान है मेरी..कभी सोचती हूं की प्रेम-विरह की राहों में उलझी नायिका हूं.. तो कभी लगता है सपनीली आंखों वाली नवयौवना हूं...कभी खुद को घर संभालती गृहिणी पाती हूं.. तो कभी दौङ-भाग करती,दफ़्तर जाती आधुनिका... कभी उस पत्थर तौङती,ईंट ढोती मजदूरिन में खुद को पाती हूं... कभी वो कपङॆ धोती,बरतन धोती भी मुझ जैसी लगती है... कभी उस पानी भरती पनिहारिन.. उस चूङी बेचती मनिहारिन... सबमें अपना ही स्वरूप देखती हूं.....

फ़िर लगता है नहीं इन सबसे बढकर पहले एक नारी हूं मैं.. नारी 'शक्ति सृजन की, तो शक्ति विध्वंस की भी'... दुर्गा का रूप हूं.. अंबा भी... रूप मुझमें काली और चंडिका का भी.... जीवनदायिनी मां का स्वरूप हूं... 'कौशल्या और यशोदा' भी मुझमें... जन्म दिया 'राम-कृष्ण' को मैंने.... तो 'कैकसी' का भी रूप मुझमें.. 'रावण' भी पनपा था मुझसे... प्रेयसी-प्रेमिका हूं 'अल्हङ राधा सी'.... तो रूप मुझमें रति का, रंभा का भी... 'सीता-सावित्री' बन धर्म निभाया मैंने... तो 'द्रौपदी, बन नींव डाली 'महाभारत' की..... रणभूमि में भी उतरी हूं तलवार लेकर.. संभाला है देश भी... हिमालय तक जा पहूंची हूं.... नापा है अंतरिक्ष भी.... खेल सकती हूं सागर से.. छू सकती हूं आकाश भी...

पर कौन समझा है मेरे इन रूपों को, मेरी इस शक्ति को... शायद स्वयं मैं भी नहीं... ये सत्य नहीं इस देश की आधी आबादी का... बस एक आवरण है मेरी वासत्विकता का.. मुझे पूजनीय कहा जाता रहा.. मूरत बना मंदिरों में बिठाया गया... पर क्या मैं सचमुच पूजी गई?.......

आज भी गर्भ में मेरी आहट या मेरा जन्म विचलित कर देता है मेरे जनक को... आज भी घिरी हूं अशिक्षा के अंधकार से.... जाने कितनी बार जली हूं अग्नि में जीवित या जलायी गई .. कभी 'दहेज की बलि वेदी' पर कभी 'सती' बनाकर... बस सौदर्य की उपमा या भोग की वस्तु ही माना गया मुझे.... तस्वीरों में उकेरी मेरी देह की कलाकृतियाओं पर मंत्रमुग्ध हैं सब... पर जब भी मैने अपने अस्तित्व के लिये नियम तोङे मेरे चरित्र पर सवाल उठाया गया... मेरी तस्वीरों का ModernArt पसंद है .. मेरा पाश्चात्यानुकरण अश्लील माना गया....आज भी बाज़ार गर्म है मेरी देह के क्रय-विक्रय का...



मुझे प्राथमिकता मिली केवल बस की सीटों या रेल की टिकट की कतार में या केवल 'कर-बचत' में नहीं... अपहरण,ब्लात्कार,शोषण, उत्पीङन इनमें भी प्राथमिकता प्राप्त है मुझे...


कब तक आखिर कब तक चलता रहेगा ये सब..? कब मुझे अपनी पहचान मिलेगी.. कब बरसों से दबे-कुचले अपने अस्तित्व को तलाश पाउंगी...कब 'शक्ति' बन 'शिव' के समान जी पाउंगी.. और कब तुम समझोगे मुझे...?

Saturday, February 17, 2007

बहुत दर्द होता है माँ..!


धरा की नम मिट्टी में दबे बीज कि तरह...
जिससे अभी अंकुर फूटा हो, बीज-पत्र लेकर..
मानो मासूम कली, जो अभी खिली भी ना हो..
जैसे सीप में पङी बूंद, जो बनेगी मोती एक दिन..
उसी तरह सुरक्षित नम कमल सी कोख में..
मैंने स्थान पाया.. शुरुआत थी ये मेरे जीवन की..
अभी कोई शक्ल कोई आकार मैंने लिये नहीं..
अभी वो रचयिता व्यसत था मुझे रूप देने में..
बस अभी हृदय ने धङकना शुरु किया था..

आप दोनों भी बहुत खुश थे.. मेरे जन्मदाता..
आपका प्रेम अब जीवंत रूप जो लेने वाला था..
मेरे आने की कई कल्पनायें संजोने लगे आप..
मेरे नाम, मेरे रूप से लेकर मेरे भविष्य तक की..
सारी योजनायें गढी जाने लगी..
रोज एक नये परिवर्तन के साथ...
ये सब सुन मेरा कोमल मन भी सपने बुनने लगा..
एक नयी दुनिया के, अपने जीवन के, आपके ममत्व के..
जाने कैसा होगा सब-कुछ.. रोज नई कल्पना मन में होती..
ऐसे ही बीत गये कुछ दिन, खुशी के पलक-पावङों पर..
फ़िर एक दिन कहीं गये आप दोनो.. संग मुझे लेकर..
वहां अजीब सी गंध थी और सफ़ेद कोट पहने आदमी..
उसे डॉक्टर कहते हैं ये जाना मैंने..
उसने कुछ यंत्रों से जाने क्या-क्या देखा..
और कुछ बताया आपको..मेरे जन्मदाता..
फ़िर एक सन्नाटा सा छा गया...
मुझ तक आती स्नेह की तरंगें रुक गयीं..
जो महसूस हो रहा था.. वो अवसाद था..
मेरा कोमल मन भयभीत हो गया..
दम घुट रहा था मेरा.. हृदय ने पुकारा..
माँ!..माँ!.. डर लग रहा है...
अचानक मेरी कोमल अविकसित देह में..
कुछ चुभने लगा.. बहुत छ्टपटाई मेरी देह..
पर उसे विदीर्ण किया जा रहा था..
रुक गये हाथ मुझे स्वरूप देते रचयिता के..
ये तो शायद उसने भी नहीं सोचा था..
रक्त की धारा बह निकली..
और मैं केवल एक मांस का छिन्न-भिन्न टुकङा..
और हृदय से बस निकली केवल एक चीत्कार.....
माँ!...माँ!.. बहुत दर्द होता है माँ.. बहुत दर्द..
और फ़िर शाँति.. शायद यही थी मेरी नियति..

जानना चाहेंगे मेरा कसूर क्या था..
मैं एक लङकी थी..
मेरा लिंग निर्धारण करवाया गया..
ताकि मेरा निश्चित हो सके मेरा जन्म..
और तय किया गया मेरा अंत..
पर क्या ये सचमुच मेरा अपराध था....???????

Saturday, February 3, 2007

एक प्रश्न उस रचयिता से....


कई बार सोचती हूं पूछुं उस रचयिता से उसकी रचनाओं का अर्थ...
अर्थ उसके हर सृजन का... अर्थ उसके हर विध्वंस का..

क्यों अन्धकार बन हर निशा वो छा जाता नभ पर,
फिर क्यों स्वयं ही उगता प्राची में सूरज बनकर,
क्या मतलब ज्योत्सना के धवल आंचल को दे शशि की झिलमिल..
फिर उस पर देना गहन आवरण अमावस बनकर,
जानना चाहती हूं उससे इस तिमिर-प्रकाश के खेल का अर्थ....

कैसे स्वरूप दिया उसने जाने कैसे ताने बाने बुनकर,
कैसे नई कहानी घढता वो अपनी हर कृति पर,
क्यों ऐसे बांधे तार दिलों के कि झंकॄत वो हर स्पर्श पर..
कैसे जोङा उसने सारे सिरों को कि हम रह जाते हर बार उलझकर,
जानना चाहती हूं उससे उसकी इस माया का अर्थ...

सब कहते हैं वो व्याप्त ब्रह्मांड के कण-कण पर,
वो हर मनुज में बसता आत्मा बनकर,
फिर क्यों मनुज स्वयं से लङता शत्रु बनकर...
क्यों रौंद डालता वो हर जीवन को अपने लक्ष्य के पथ पर,
जानना चाहती हूं अपनी इस अग्यानता का अर्थ.....

सत्य शाश्वत मृत्यु है और ये जीवन ‌क्षणभंगुर नश्वर,
हम सारे यहां उस अनंत पथ के हमसफ़र,
है सब को ग्यात ये सत्य फिर भी...
फ़िर कैसा हर्ष कैसा विषाद, जीवन के आरंभ-अंत पर,
जानना चाहती हूं अपनी इन भावनाओं का अर्थ...

Friday, January 26, 2007

आज क्या है.. गणतंत्र दिवस ?


आज गणतंत्र दिवस है...( याद है ना?)... आप सब को मेरी हार्दिक शुभकामनायें.. मुझे बचपन से स्वंतत्रता दिवस/गणंतत्र दिवस ये दोनों दिन बहुत अच्छे लगते हैं।जब छोटी थी तब स्कूल जाना परेड में भाग लेना, झंडा फ़हराना, फ़िर शपथ ग्रहण मुझे ये सब बहुत पसंद थे। मुझे याद है जब मैं छोटी थी मम्मी से हमेशा इन दिनों पर कुछ पकवान बनाने कि जिद करती थी, जब पहली बार कहा था तो मम्मी ने पूछा था क्यों ? मैने कहा "क्यों नहीं जब होली, दिवाली पर बनाते हो तो आज क्यों नहीं ? ये तो पूरे देश के त्योहार हैं और तब से आज तक ये सिलसिला जारी है.. बस अब खाना मै बनाती हूं। इन दिनो में सुबह उठ्ते हि चारों तरफ़ बजते देशभक्ति के गीत और लहराते-फहराते तीन रंग मन को आंनद से उमंगो से भर देते थे।

पर आज कि सुबह तो कुछ और ही थी। सुबह उठी तो चारों तरफ़ शांति छाई थी न कोइ कोलाहल ना ही कोई शोर.. अरे आज तो छुट्टी है ना.. फिर किसे जल्दी है उठकर कहीं जाने की! कहीं देशभक्ति गीत बजना तो दूर की बात किसी भी इमारत पर मुझे वो तिरंगा तक नहीं दिखा। खुद हमारे कोम्प्लेक्स मे दो दिन पहले सरस्वती पूजा बङी धूमधाम से मनाई गई थी पर आज सब सो रहे थे।मेरे कमरे की खिङकी के ठीक सामने एक स्कूल दिखता है.. मैंने सोचा यहां तो जरूर कोई कार्यक्रम हो रहा होगा ये सोच कर वहां झांका, पर.. सूना पङा था विद्यालय का प्रांगण। ये है देश के भावी नागरिकों कि तैयारी...????!!!!!
मैंने सोचा कि टेलीविज़न आन करती हूं शायद एह्सास हो की आज गणंतत्र दिवस है, पर मेरे मन की अभिलआषाओं को और निराश करते हुये किसी चैनल पर ऐसा कुछ नहीं दिखाई दिया जिससे ये याद आता कि आज.....। हां कुछ देर बाद नेशनल चैनल पर परेड का सीधा प्रसारण जरूर आने वाला था।पर क्या आज यही रह गया है २६ जनवरी या १५ अगस्त का महत्व हमारे लिये.. ? क्या सिर्फ़ एक और छुट्टी का दिन.. क्या हमारे दिलों मे देश के प्रति प्यार बिल्कुल ही खत्म हो चुका है.. क्या हम देश के प्रति संवेदनहीन हो चुके हैं.. ? क्यों आज का युवा भारतीय वेलेंटाइन डे, फ्रेंडशिप डे या रोज़ डे कि तरह १५ अगस्त या २६ जनवरी की तरफ़ आकर्षित नहीं है। क्या सिर्फ़ सेना के जवानों की परेड और स्कूली बच्चों के प्रोग्राम ही काफी है हमारी जिम्मेदारी पूरी करने के लिये ..? क्यों हम आज के दिन पिकनिक या मूवी जाना ज्यादा पसंद करते है...? क्यों हम भूल गये हैं स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस को .. क्यों ये सिर्फ़ २६ जनवरी या १५ अगस्त है.. अवकाश का एक और दिन..?

और जाते-जाते एक और अंतिम किन्तु मह्त्वपूर्ण सवाल..... Republic Day... गंणतंत्र दिवस.. .. Is India really Republic... ? मुझे तो नहीं लगता..( क्यों कहना जरूरी नहीं समझती)..। आइए आप भी कुछ कहिये...

Thursday, January 25, 2007

शीशे से बनी एक लङकी..



शीशे से बनी एक लङकी को देखा मैनें पत्थर के शहर में,


पलकें झपकाती देखती थी दुनिया को.....


शीशे की बनी प्यारी आंखें,झरने सी हंसी और आंसू मोती जैसे,


सवाल बिखरे थे चेहरे पर उसके...


पतझङ क्यों आता है-?.. मानो कली ने पुछा हो मौसम से जैसे,


दुनिया ऐसी क्यों है..?


वो पूछ बैठी मुझसे....... बिल्कुल वैसे,


मेरे दिल ने कहा-कैसे चली आई तुम ?


कांटों के नगर, फ़ूलों के गांव से....


बोलो ना क्यों है सबकुछ ऐसा- ?


फ़िर पूछा उसने मुझसे...


अभी नादान हो कैसे समझोगी दुनिया को?


हंसकर कहा मैनें....


नहीं बताओ मुझको, मचल पङी मेरा हाथ पकङकर,


बचना चाहा सवाल से और हाथ छुङाना चाहा मैनें...


पर मेरे मन को बांध लिया था उसने,


कैसे छोङोगी मुझको...


सवाल था उसके होठों पर,


मुस्कुरा कर पिघल गया मेरा पत्थर दिल भी...


जल गया अंधेरे में स्नेह का दीप,


अब वो साथ रहती है मेरे..


देखती है दुनिया को, पुछती है सवाल कई,


और ढूंढ्ती है जवाब मेरी खामोशी में........


Sunday, January 21, 2007

एक सवाल क्या है ज़िंदगी...?


रोज हर एक नये सूरज के साथ मेरे मन में उठता है हर रोज सिर्फ़ एक सवाल कि ज़िन्दगी क्या है... और रोज ढूंढती हूं ज़िंदगी को अपने आस-पास। सुबह उठकर रोजमर्रा के काम निपटाती सोचती हूं क्या ये ज़िंदगी है... फ़िर मन कहता है नहीं। फ़िर जब घर से निकलती हूं दफ़्तर जाने को.. आस-पास लोगों की भीड को... अलग-अलग लोग सब अपनी जल्दबाज़ी में व्यस्त.. अपनी मन्ज़िल पर सबको पहुंचना है ज़ल्द से ज़ल्द, क्या ये ज़िन्दगी है.. नहीं-नहीं ये तो बेशक नहीं है। इतने में मेरी बस आ जाती है और खिडकी कि पास वाली सीट खाली देख वहीं बैठती हूं मैं.. और फ़िर सोचने लगती हूं। बस सिग्नल पर रूक जाती है और मैं देखती हूं सडक के किनारे बैठे एक परिवार को .. तीन लोग हैं वो.. कागज़ इकट्ठे करती पत्नी और लकडी पर आरी चलाता पति.. और उनका २-३ साल का बच्चा... और उसके हाथ में कोई खिलौना नहीं बाप ने थमा रखी थी एक छोटी आरी, और उसे चलाता देख खुश थे दोनों.. लगा शायद यहां है ज़िंदगी.. पर कैसी विडंबना है ये.. मन भर आया। फ़िर देखती हूं अपने आस-पास .. एक सांवली छोटी बच्ची.. इतना मासूम चेहरा, कोमल... हाथ में एक कागज़ का पैकेट थामे हुये.. बार-बार उसमें झांक रही थी.. फ़िर अपनी मां के तरफ़ देखा.. कुछ पुछा प्यारी आंखों से.. फ़िर मुस्करा कर पैकेट से बाहर निकाली एक जलेबी.. हर बार जब वो एक कौर खाती थी .. जो संतोष उसके चेहरे पर आता था वो तो शयद मैने छ्प्पन भोग खाकर भी नहीं पाया था कभी.. उसे खत्म कर अपनी उंगलियां चाट ली उसने और फ़िर एक मासूम तॄप्त मुस्कुराहट.. मैं भी मुस्कुरा पङी भीतर तक.. ज़िंदगी ये भी है.. सारी वितॄष्णा कहीं भाग गयी थी। तब तक दफ़्तर आ गया और मैं उतरी अपने स्टोपेज पर रोज की तरह... उफ़! सङक के बीच गिरा पङा था एक इन्सान.. शायद बेहोश था.. आस-पास से गुजर रही थी गाङियां और लोग भी पर कोई नहीं रूका... कौन झमेले में फ़ंसे.. यही सबका विचार था .. मैन भी उसे देखते हुये, और कुछ करने कि सोचते हुये गुजर गई , पर किया कुछ भी नहीं.. पूरा दिन मेरी आत्मा कचोटती रही मुझे.. खाना भी नहीं खाया गया, क्या यही है मेरे आदर्श.. क्या ऐसे जीनी है ज़िंदगी.. बस घर और दफ़्तर... क्या यही चाहा था अपने आप से... नहीं ऐसा तो नहीं चाहा था।

जब पार्टियों मे जाती हूं और देखती हूं नकली मुस्कान ओढे, लिपे-पुते चेहरे.. जैसे सारी दुनिया में सब खुश हैं ... पर ऐसा कुछ नहीं है.. सब अपनी भङास निकाल रहे होते हैं... और हाथों मे ग्लास या खाने की प्लेट और चर्चाएं पूरी दूनिया की.. गुस्सा इतना मानो सारा बोझ इन्हीं के सरों पर हो.. दिखावा .. क्या ये है ज़िंदगी... और रोज ऐसे ही बीत जाता है दिन.. मैं घर लौटती हूं.. वही सब कूछ देखते हुये सोचते हुये.. आकर फ़िर वही रोज के काम... फ़िर लिखती हूं कोई कविता .. कोशिश करती हूं ज़िंदगी को अर्थ देने का... और सो जाती हूं सोचते हुये .. क्या है ज़िन्दगी फ़िर कल जवाब ढूंढ्ने के लिये........

Monday, January 15, 2007

क्यों जाये सीता ही हरबार वनवास


राम क्यों जाये सीता .. हर बार वनवास तुम्हारे साथ? क्यों दे हर बार वो एक और अग्नि परिक्षा.. क्यों तुम ने नहीं दी राम तुमने भी एक अग्नि परिक्षा.. तुम भी तो रहे थे एकाकी वन विचरण करते.. फिर तुम कैसे नहीं आये परिक्षा के दायरे में..? तुमने तो कुछ भी नहीं खोया.. सब पाया वापस लौटे जब अयोध्या.. पर क्या पाया जनक नंदिनी ने दे कर तुम्हारा साथ.. एक गर्भ और उस पर एक और वनवास.. कैसे दे पाये वनवास तुम राजा राम.. किसने दिया तुम्हें अधिकार... और जब दिया तो क्यों नहीं तुम भी चल दिये उसके साथ .. क्यों नहीं निभाया तुमने पतिव्रत धर्म .. कैसे कहलाये तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम... क्यों नहीं जीया तुमने एक और वनवास... कैसे समाने दिया तुमने वैदेही को धरा में.. कैसे देख पाये तुम , कैसे जी पाये तुम... क्यों तुम्हें तुम्हारी आत्मा ने नहीं धिक्कारा.. कहो ना जानकी वल्लभ .. कहो ना रघुपति राघव राजा राम ... क्यॉ जाये सिर्फ सीता ही हर बार वनवास... हर बार समये वो हि धरती में .. और दे वो ही अग्नि परिक्षा..