Thursday, January 25, 2007

शीशे से बनी एक लङकी..



शीशे से बनी एक लङकी को देखा मैनें पत्थर के शहर में,


पलकें झपकाती देखती थी दुनिया को.....


शीशे की बनी प्यारी आंखें,झरने सी हंसी और आंसू मोती जैसे,


सवाल बिखरे थे चेहरे पर उसके...


पतझङ क्यों आता है-?.. मानो कली ने पुछा हो मौसम से जैसे,


दुनिया ऐसी क्यों है..?


वो पूछ बैठी मुझसे....... बिल्कुल वैसे,


मेरे दिल ने कहा-कैसे चली आई तुम ?


कांटों के नगर, फ़ूलों के गांव से....


बोलो ना क्यों है सबकुछ ऐसा- ?


फ़िर पूछा उसने मुझसे...


अभी नादान हो कैसे समझोगी दुनिया को?


हंसकर कहा मैनें....


नहीं बताओ मुझको, मचल पङी मेरा हाथ पकङकर,


बचना चाहा सवाल से और हाथ छुङाना चाहा मैनें...


पर मेरे मन को बांध लिया था उसने,


कैसे छोङोगी मुझको...


सवाल था उसके होठों पर,


मुस्कुरा कर पिघल गया मेरा पत्थर दिल भी...


जल गया अंधेरे में स्नेह का दीप,


अब वो साथ रहती है मेरे..


देखती है दुनिया को, पुछती है सवाल कई,


और ढूंढ्ती है जवाब मेरी खामोशी में........


10 comments:

Upasthit said...

Man ke ekaant, andhere aur sarvatha guudh, kono se likhi gayi itani nitaant atmeeya kavitayen, kalpana ke pankhon ko bal deti hain. Ek kshitij naya khoj nikaalti hain....khud kuch bhee spasht na kah sab kuch pathak ke maththe daal khisaksi li kavita....

manya said...

Dhanyawad Ravindra...Jo itna kuchh bhaari bharkam kaha aur phir anth me khud bhi dheere s apni baat kahate huye khisak liye.. phir aaiyega.. Aap bhi achchha likhte hain..

गीतकार said...

हमेशा दिल को संभाले हुए यहाम रखना
ये शहरे शीशा नहीम पत्थरों की बस्ती है

Upasthit said...

Is baar saaf kahunga...:)
Mujhe apke "Aap bhi achchha likhte hain", se thodi se samasya hai. Maine to kahin nahi kaha apne comment me par apka atmavishvas achcha laga...Ap aisa likhne ke mauke deti rahengi to main kya sab baar baar ayenge...

Divine India said...

भाई उपस्थित!…ती दर्शाने का ऐसा मौका कहाँ मिलेगा तुम्हें…समस्या और नये समस्याओं का मुख खोलती हैं इसकारण्…कविताओं में स्वयं को तलाशना बंद करो…

Hi Manya,
नये विषय को काफी सलीकेदार कोणों में व्यक्त किया है…पर अगर वह मेरे साथ होती तो मेरे सत्य उसके जबाव बनते…"फूल बनने की खुशी में मुस्कुरा रही थी कली…क्या खबर थी तगे…युगर मौत का पैगाम है…" सुंदर अभिव्यक्ति!

manya said...

Upasthit Ji.. mera wo comment aapke blog ko padhne ke baad diya gaya tha .. shayad aapne apne blog par mera comment nahiM dekha.. aur aap bilkul saaf boliye.. mujhe koi aapatti nahi .. par pahle ye to samajhiye main kya khna chahti hun...

Divya.. thnx again.. n u too said well.. abki baar use tumhaare paas bhej dungi..

dhanywaad Geetkar Ji.. sahi kaha ye pathron ki hi basti hai.. par pathar me phool hame khilane hn.. umeed hai ap log saath denge..

DR PRABHAT TANDON said...

बहुत ही सुंदर रचना !

Jitendra Chaudhary said...

कैसे छोङोगी मुझको...
सवाल था उसके होठों पर,
मुस्कुरा कर पिघल गया मेरा पत्थर दिल भी...
जल गया अंधेरे में स्नेह का दीप,
अब वो साथ रहती है मेरे..
देखती है दुनिया को, पुछती है सवाल कई,
और ढूंढ्ती है जवाब मेरी खामोशी में.....


वाह! वाह! क्या बात है। कई बार कुछ कविताएं दिल का हाल बयां कर जाती है, ऐसी कविताएं दिल को छू जाती है। ऊपर की पंक्तिया भी कुछ ऐसी है।

Upasthit said...

:)...thanks.(Apko BHEE divyabh bhai)

ranju said...

यहाँ हर कोई अपने वजूद को तलाश रहा
शीशो के नगर में कैसे कोई अपने नाज़ुक दिल को संभाले !!

बहुत ख़ूब लिखा है