Friday, January 19, 2007

तन्हाई ही तन्हाई है....


सूना-सूना सबकुछ लगता, गहरी - गहरी एक उदासी छाई है.....


कहीं खो गई हंसी लबों की , रोका कितना फ़िर भी आंखें भर आई हैं...


बोझल- बोझल धडकन दिल की, सांसे मानो खुद से ही घबराई हैं...


अन्धेरे में डूबा घर है सारा, शायद शाम गमों की घिर आयी है...


कहो आवाज़ दूं कहां किसी को, यहां तो बस तन्हाई ही तन्हाई है...


मुझे छोड कर चल दी है जो, वो मेरी ही परछाईं है...


सन्नाटे में भी जो गीत लिखे, तो लगा याद किसी की आई है....


बहूत संभाल कर थामा था सब, फ़िर भी सूनी हथेली पर चंद लकीरें ही पाई हैं......






"हर पल हर सांस अजनबी है, तुम बिन सब अधूरा ....

सब तरफ़ कमी सी है.... "

4 comments:

मनीष...Manish said...

"मुझे छोड कर चल दी है जो, वो मेरी ही परछाईं है...
सन्नाटे में भी जो गीत लिखे, तो लगा याद किसी की आई है"

भाव अच्छा है पर कविता में प्रवाह पैदा करने के लिए इन पंक्तियों को ऐसे भी लिख सकती हैं

मुझे छोड कर चल दी मेरी ही परछाईं है
सन्नाटे में गीत लिखे या याद किसी की आई है

manya said...

thnx manish ... for liking it n ur suggestions.. par yahan mera matlab us jaane wale se hai jo meri parchaai jaisa hai.. aur sannate me bhi agar geet likhe jaaye to iska matlab hi hai ki koi khayalon me basta hai.. aage bhi aapke suggestion dijiyega... shukriya..

Divine India said...

सर्वप्रथम मनीश,
कहते है कवि की मनोदशा का पता तो कवि को भी
नहीं होता क्योंकि लिखते समय तो वह भावविभोर अचेतन की स्थिती में होता है…बदलाव तो मैने कामायनी में भी महसूस की है किंतु वह मेरा नजरीया है एक कवि का नहीं॥

हां Manya...,
जो गीत तन्हाई के गाये हैं तुमने उसे अंधेरे में ही
लिखने बैठ गईं उजाला कितना पास है तुम्हें
हंसाने के लिये…अच्छी लगी किंतु पहले मैंने तुम्हारी
नीचे वाली कविता को पढ़ा तो उपमा में पहले ही
फंस गया इसकारण ठहर न पाया बहुत देर इसपर्…॥

manya said...

thanks Divya... y not to mention...