Friday, October 17, 2008

क्षितिज के उस पार.............


" उनका मिलना एक अजीब इत्तफ़ाक था... शायद कभी सपने में भी सोचा नहीं होगा दोनों ने की किसी से यों भी मिलना होगा....... पर मिले तो सही... मिलना तय था मानो.... पहली बार मिल के लगा ही नहीं की.... पहली बार ! मिले हों......... क्या सचमुच पहली बार मिले थे? हां ऐसा कई बार होता है की जब किसी को मिलकर लगे की आप उसे हमेशा से जानते हैं..... पर उनके लिये तो ये पहली बार था... और बिल्कुल अलग और अजीब था.... उनके लिये... दोनों ये सोचकर मिले थे की शायद दुबारा कभी ना मिलेंगे... पर! अब करीब एक घंटा या ज्यादा बीत चुका है... पर ये छॊटी सी औपचारिक मुलाकात खत्म नहीं हुई अब तक... वो बोल रही है.... और वो सुन रहा है... एक की आंखें चमक रही है.. दुसरे के लब मुस्कुरा रहे हैं... क्या दोनों सचमुच बातें कर रहे हैं... नहीं.. दोनों बस साथ हैं एक दुसरे के.... बस धड़्कन कह रही है और आंखें सुन रही हैं... कभी आंखें कहती हैं और लब सुनते हैं.... पर वक्त ! वो किसी की नहीं सुनता.. वो तो बीतता जा रहा है.. अरे काफ़ी देर हो गयी अब चलना चाहिये हमें... ऐसा कहा किसी ने.. या मह्सूस किय......... दोनों उठ खड़े हुये.. चलने को...


पर मुलाकात खत्म नहीं हुई थी.. दोनो सिन्दूरी सड़क पर साथ चल रहे थे.. बस कुछ देर और... फ़िर तो जाना ही है.. अपनी अपनी राह पर.... "मुझे तुमसे मिलना बेहद अच्छा लगा... हां वक्त कब बीत गया पता ही नहीं चला....... वक्त? .... नहीं.... वक्त नहीं कई जन्म बीते हैं हमारे... एक साथ... और इस बार भी मिलना ही था हमें.... नहीं पता ये क्या है.. प्यार... आकर्षण .. या फ़िर कुछ और... पर तुम मुझे बहुत अच्छी लगी... मैं तुमसे रोज़ मिलना चाह्ता हूं.. मिलोगी ना.... ? " उसने बस नज़रें झुकायी... और मुस्कुरा कर देखा उसे.. और चल दी....


अब दोनों रोज़ मिलते हैं.. हर शाम... सिंदूरी सड़क पे साथ चलते है... फ़िर से बिछ्ड जाने को... हां, बिछ्ड़ जाने को... इस जनम में बस यूं ही मिल सकेंगे वो.... एक ना हो सकेंगे कभी... उसकी आंखें भीग जाती हैं.. ये सोच कर... क्यूं इतनी देर से मिले तुम... जब तुम्हें और मुझे दोनों को... कुछ और वादे निभाने हैं.. ये कैसा साथ है जो होकर भी नहीं... नहीं मिलना था हमें...... और वो मुस्कुरा पड़ता..... दर्द के निशां .. चेहरे पे होते... कहता .. " ये नाटक मत करो तुम... रोते हुये बिल्कुल अच्छी नहीं लगती तुम... गंदी लगती हो... एकदम बुरी.. मगरमच्छ के आंसू" और वो मुस्कुरा पड़ती......


"मैंने वादा किया है ना तुमसे... मैं हूं रहूंगा.. हमेशा... तुम्हारे आस - पास....... " " झूठ बोलते हो तुम... ऐसे कोई साथ नहीं देता...... " वो टोकती........ वो देखता उसे... और वो फ़िर नज़रें झुका लेती.. चुप... " मैं जो कहता हूं सुनो... मैं अब भी सथ हूं हर पल... और वादा करता हूं .. हर जन्म .. हर रूप में साथ दूंगा... फ़िर कभी देर नहीं होगी.. बस तुम विश्वास करो.. साथ दो........ " उसकी नज़रें झुकी ही रहीं.. पर आंखों में आंसू नहीं विश्वास था........


और प्रेम.... वो बह्ता रहा... इस धड़कन से उस धड़कन तक... अविरल...... आज भी बहता है.. .. चुपचाप... पर मिलन को आतुर.. व्याकुल.... शायद क्षितिज के उस पार.... !"




7 comments:

Rachna Singh said...

prose aur poetry dono par pakd baemissal haen

makrand said...

the lines are well composed
great effort
keep writing
u got amazing explanation power of emotions
regards

hemant said...

Mind blowing presentation keep on such writing...............

mehek said...

prem ka sundar ehsaas bandh diya hai,bahut khubsurat

neeshoo said...

आपने बहुत लिखा है । लाजवाब
मान्या जी आपसे एक ही निवेदन है कि कविता को यदि लाइन से लिखती तो और भी अच्छा होता ।वैसे कुछ पढ़ने में दिक्कत होती है ।

सुशील कुमार छौक्कर said...

पहली बार आना हुआ। अच्छा लगा पढकर।
जब किसी को मिलकर लगे की आप उसे हमेशा से जानते हैं। तो ........।

Mired Mirage said...

बहुत दिन बाद आपकी रचना पढ़ने को मिली। अच्छी लगी।
घुघूती बासूती