Sunday, November 25, 2007

कुछ इस तरह... जिंदगी मिली मुझसे...


कुछ इस तरह...

जिंदगी मिली मुझसे...

जैसे मिला हो कोई....

अजनबी...अचानक.. यूं ही...

साथ निभाये दो पल का...

और दूर चला जाये....

कुछ इसी तरह....

जिंदगी मिली मुझसे....

कहा कुछ नहीं....उसने...

बस दो निगाहें..उसकी...

करती रही हजार सवाल...

खामोशी मेरी कहती रही...

बस इसी तरह ...

जिंदगी ने बात की मुझसे...

अभी वक्त है....

तलाश खत्म होने में....

पर फिर मिलूंगी...

कभी ना लौटने को...

और फ़िर इस तरह....

जिंदगी बिछड़ गयी मुझसे....

7 comments:

जिंदगी said...

great work manya

Sanjeeva Tiwari said...

खामोशी में खुद के प्रश्‍न से अनुत्‍तरित हो जाना स्‍वयं एक कविता है । सुन्‍दर । बधाई ।

www.aarambha.blogspot.com

Divine India said...

बिछड़ी हुई जिंदगी का यह कविता रुपी अक्स इतना सुंदर है तो जो जी लिया है तुमने उसका अहसास कितना प्रांजल होगा…।

मीत said...

लाजवाब .............. हो गया हूँ. Simply lost .... Just too good, or may be you just said something that I so badly wanted to. Someone had mentioned your name sometime back and this is the first time I am here .... on your space. The rythm, the continuity ... is striking.

Also, it has triggered 4 lines in me.. but I'd rather post them on my blog. Great being here, manya.

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर !
घुघूती बासूती

कंचन सिंह चौहान said...

इतनी सुंदर कविता कि व्यक्ति निश्शब्द हो जाये।

Sanjeev Kr. said...

कहा कुछ नहीं....उसने...
बस दो निगाहें..उसकी...
करती रही हजार सवाल...
खामोशी मेरी कहती रही...
बस इसी तरह ...
जिंदगी ने बात की मुझसे...

Kuchh shabd nahi manya ji, kya kahen, Bas ye Aankhey padhti rah gaii aapki sunder rachna.