Dard..............
जले ज़ख्मों पे नमक कौन छिड़कता है...
जिस्म छिलने से मुझे कहां दर्द होता है...
मेरे रिसते जख्मों को मरहम की तलाश नहीं....
होने दो अब दर्द की बारिश....
ज़िंदा रहने को समंदर भी अब कम पड़ता है...
मुझे मीठी झील की प्यास नहीं....
ना उसने मुझे समझा कभी...
हाथ में सवालों के पत्थर उठाये खड़ा है आईना...
ये अक्स मेरा है... पर इसे मेरी पहचान नहीं...
मेरी तकदीर की लकीरों में अब मुस्कान नहीं...







