Friday, January 26, 2007

आज क्या है.. गणतंत्र दिवस ?


आज गणतंत्र दिवस है...( याद है ना?)... आप सब को मेरी हार्दिक शुभकामनायें.. मुझे बचपन से स्वंतत्रता दिवस/गणंतत्र दिवस ये दोनों दिन बहुत अच्छे लगते हैं।जब छोटी थी तब स्कूल जाना परेड में भाग लेना, झंडा फ़हराना, फ़िर शपथ ग्रहण मुझे ये सब बहुत पसंद थे। मुझे याद है जब मैं छोटी थी मम्मी से हमेशा इन दिनों पर कुछ पकवान बनाने कि जिद करती थी, जब पहली बार कहा था तो मम्मी ने पूछा था क्यों ? मैने कहा "क्यों नहीं जब होली, दिवाली पर बनाते हो तो आज क्यों नहीं ? ये तो पूरे देश के त्योहार हैं और तब से आज तक ये सिलसिला जारी है.. बस अब खाना मै बनाती हूं। इन दिनो में सुबह उठ्ते हि चारों तरफ़ बजते देशभक्ति के गीत और लहराते-फहराते तीन रंग मन को आंनद से उमंगो से भर देते थे।

पर आज कि सुबह तो कुछ और ही थी। सुबह उठी तो चारों तरफ़ शांति छाई थी न कोइ कोलाहल ना ही कोई शोर.. अरे आज तो छुट्टी है ना.. फिर किसे जल्दी है उठकर कहीं जाने की! कहीं देशभक्ति गीत बजना तो दूर की बात किसी भी इमारत पर मुझे वो तिरंगा तक नहीं दिखा। खुद हमारे कोम्प्लेक्स मे दो दिन पहले सरस्वती पूजा बङी धूमधाम से मनाई गई थी पर आज सब सो रहे थे।मेरे कमरे की खिङकी के ठीक सामने एक स्कूल दिखता है.. मैंने सोचा यहां तो जरूर कोई कार्यक्रम हो रहा होगा ये सोच कर वहां झांका, पर.. सूना पङा था विद्यालय का प्रांगण। ये है देश के भावी नागरिकों कि तैयारी...????!!!!!
मैंने सोचा कि टेलीविज़न आन करती हूं शायद एह्सास हो की आज गणंतत्र दिवस है, पर मेरे मन की अभिलआषाओं को और निराश करते हुये किसी चैनल पर ऐसा कुछ नहीं दिखाई दिया जिससे ये याद आता कि आज.....। हां कुछ देर बाद नेशनल चैनल पर परेड का सीधा प्रसारण जरूर आने वाला था।पर क्या आज यही रह गया है २६ जनवरी या १५ अगस्त का महत्व हमारे लिये.. ? क्या सिर्फ़ एक और छुट्टी का दिन.. क्या हमारे दिलों मे देश के प्रति प्यार बिल्कुल ही खत्म हो चुका है.. क्या हम देश के प्रति संवेदनहीन हो चुके हैं.. ? क्यों आज का युवा भारतीय वेलेंटाइन डे, फ्रेंडशिप डे या रोज़ डे कि तरह १५ अगस्त या २६ जनवरी की तरफ़ आकर्षित नहीं है। क्या सिर्फ़ सेना के जवानों की परेड और स्कूली बच्चों के प्रोग्राम ही काफी है हमारी जिम्मेदारी पूरी करने के लिये ..? क्यों हम आज के दिन पिकनिक या मूवी जाना ज्यादा पसंद करते है...? क्यों हम भूल गये हैं स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस को .. क्यों ये सिर्फ़ २६ जनवरी या १५ अगस्त है.. अवकाश का एक और दिन..?

और जाते-जाते एक और अंतिम किन्तु मह्त्वपूर्ण सवाल..... Republic Day... गंणतंत्र दिवस.. .. Is India really Republic... ? मुझे तो नहीं लगता..( क्यों कहना जरूरी नहीं समझती)..। आइए आप भी कुछ कहिये...

Thursday, January 25, 2007

पुकार.........


एक झीने पर्दे के उस पार,

मैने देखा.....

खुद को, अकेले तन्हा,

एक नदी के पास....

चुपचाप- खामोश,

देख रही थी मैं...

लहरों क आना,

साहिल के पत्थरों से टकराना..

और लौट पङना...।

मैं सुन रही थी,

उन अनसुनी आवाज़ों को...

जो वक्त के साथ,

खो गयी थी कहीं...

नीचे अकेली धरती,

उपर तन्हा-अनंत आकाश...

सन्नाटा फ़ैला था मेरे आस-पास,

ऐसे में.......

क्या फ़िर तुम्हें पुकारूं आज.....?

दोगे मेरा साथ......?

शीशे से बनी एक लङकी..



शीशे से बनी एक लङकी को देखा मैनें पत्थर के शहर में,


पलकें झपकाती देखती थी दुनिया को.....


शीशे की बनी प्यारी आंखें,झरने सी हंसी और आंसू मोती जैसे,


सवाल बिखरे थे चेहरे पर उसके...


पतझङ क्यों आता है-?.. मानो कली ने पुछा हो मौसम से जैसे,


दुनिया ऐसी क्यों है..?


वो पूछ बैठी मुझसे....... बिल्कुल वैसे,


मेरे दिल ने कहा-कैसे चली आई तुम ?


कांटों के नगर, फ़ूलों के गांव से....


बोलो ना क्यों है सबकुछ ऐसा- ?


फ़िर पूछा उसने मुझसे...


अभी नादान हो कैसे समझोगी दुनिया को?


हंसकर कहा मैनें....


नहीं बताओ मुझको, मचल पङी मेरा हाथ पकङकर,


बचना चाहा सवाल से और हाथ छुङाना चाहा मैनें...


पर मेरे मन को बांध लिया था उसने,


कैसे छोङोगी मुझको...


सवाल था उसके होठों पर,


मुस्कुरा कर पिघल गया मेरा पत्थर दिल भी...


जल गया अंधेरे में स्नेह का दीप,


अब वो साथ रहती है मेरे..


देखती है दुनिया को, पुछती है सवाल कई,


और ढूंढ्ती है जवाब मेरी खामोशी में........


Monday, January 22, 2007

वो बचपन के दिन....


कितने अच्छे थे वो कुछ दिन, जब प्यारा-प्यारा बचपन था,

और था निश्छल-निर्मल मन....

जब मुस्काते थे हर पल-छिन,

कितने अच्छे थे वो कुछ दिन.....


जब झूला था बांहों का, और गोद का था बिस्तर,

जब सुला देती थी लोरी की धुन...

कितने अच्छे थे वो कुछ दिन....


जब सुना करते थे कहानीयां, और सपनों में थी परियां,

जब नया खेल था हर नये दिन...

कितने अच्छे थे वो कुछ दिन....


अब ढूंढता है दिल, वो खेल-खिलौने वो साथी,

वो पल में रोना, पल में हंसना...

वो नन्हा-मुन्ना बचपन,

वो सोने चांदी की रातें, वो हीरे मोती से दिन...

सच कितने अच्छे थे वो कुछ दिन..........

Sunday, January 21, 2007

एक सवाल क्या है ज़िंदगी...?


रोज हर एक नये सूरज के साथ मेरे मन में उठता है हर रोज सिर्फ़ एक सवाल कि ज़िन्दगी क्या है... और रोज ढूंढती हूं ज़िंदगी को अपने आस-पास। सुबह उठकर रोजमर्रा के काम निपटाती सोचती हूं क्या ये ज़िंदगी है... फ़िर मन कहता है नहीं। फ़िर जब घर से निकलती हूं दफ़्तर जाने को.. आस-पास लोगों की भीड को... अलग-अलग लोग सब अपनी जल्दबाज़ी में व्यस्त.. अपनी मन्ज़िल पर सबको पहुंचना है ज़ल्द से ज़ल्द, क्या ये ज़िन्दगी है.. नहीं-नहीं ये तो बेशक नहीं है। इतने में मेरी बस आ जाती है और खिडकी कि पास वाली सीट खाली देख वहीं बैठती हूं मैं.. और फ़िर सोचने लगती हूं। बस सिग्नल पर रूक जाती है और मैं देखती हूं सडक के किनारे बैठे एक परिवार को .. तीन लोग हैं वो.. कागज़ इकट्ठे करती पत्नी और लकडी पर आरी चलाता पति.. और उनका २-३ साल का बच्चा... और उसके हाथ में कोई खिलौना नहीं बाप ने थमा रखी थी एक छोटी आरी, और उसे चलाता देख खुश थे दोनों.. लगा शायद यहां है ज़िंदगी.. पर कैसी विडंबना है ये.. मन भर आया। फ़िर देखती हूं अपने आस-पास .. एक सांवली छोटी बच्ची.. इतना मासूम चेहरा, कोमल... हाथ में एक कागज़ का पैकेट थामे हुये.. बार-बार उसमें झांक रही थी.. फ़िर अपनी मां के तरफ़ देखा.. कुछ पुछा प्यारी आंखों से.. फ़िर मुस्करा कर पैकेट से बाहर निकाली एक जलेबी.. हर बार जब वो एक कौर खाती थी .. जो संतोष उसके चेहरे पर आता था वो तो शयद मैने छ्प्पन भोग खाकर भी नहीं पाया था कभी.. उसे खत्म कर अपनी उंगलियां चाट ली उसने और फ़िर एक मासूम तॄप्त मुस्कुराहट.. मैं भी मुस्कुरा पङी भीतर तक.. ज़िंदगी ये भी है.. सारी वितॄष्णा कहीं भाग गयी थी। तब तक दफ़्तर आ गया और मैं उतरी अपने स्टोपेज पर रोज की तरह... उफ़! सङक के बीच गिरा पङा था एक इन्सान.. शायद बेहोश था.. आस-पास से गुजर रही थी गाङियां और लोग भी पर कोई नहीं रूका... कौन झमेले में फ़ंसे.. यही सबका विचार था .. मैन भी उसे देखते हुये, और कुछ करने कि सोचते हुये गुजर गई , पर किया कुछ भी नहीं.. पूरा दिन मेरी आत्मा कचोटती रही मुझे.. खाना भी नहीं खाया गया, क्या यही है मेरे आदर्श.. क्या ऐसे जीनी है ज़िंदगी.. बस घर और दफ़्तर... क्या यही चाहा था अपने आप से... नहीं ऐसा तो नहीं चाहा था।

जब पार्टियों मे जाती हूं और देखती हूं नकली मुस्कान ओढे, लिपे-पुते चेहरे.. जैसे सारी दुनिया में सब खुश हैं ... पर ऐसा कुछ नहीं है.. सब अपनी भङास निकाल रहे होते हैं... और हाथों मे ग्लास या खाने की प्लेट और चर्चाएं पूरी दूनिया की.. गुस्सा इतना मानो सारा बोझ इन्हीं के सरों पर हो.. दिखावा .. क्या ये है ज़िंदगी... और रोज ऐसे ही बीत जाता है दिन.. मैं घर लौटती हूं.. वही सब कूछ देखते हुये सोचते हुये.. आकर फ़िर वही रोज के काम... फ़िर लिखती हूं कोई कविता .. कोशिश करती हूं ज़िंदगी को अर्थ देने का... और सो जाती हूं सोचते हुये .. क्या है ज़िन्दगी फ़िर कल जवाब ढूंढ्ने के लिये........

Saturday, January 20, 2007

मेरा क्या है.....


क्या करुं मैं जो इसे चाहत है किसी की,

जो ये चाहता है तुम्हें ही...

ये तो बस मेरा दिल है और दिल का क्या है


क्या करूं मैं जो ये बसे हैं आंखों में,

जो ये बस तुम्हारे हैं..

ये तो बस मेरे ख्वाब हैं मेरे और ख्वाबों का क्या है


क्या करुं मैं जो मन महसूस करता है इन्हें,

जो इन में बस तुम समाये हो..

ये तो बस एह्सास है मेरे और एह्सासों का क्या है


क्या करुं मैं जो इन्हें इन्त्ज़ार है किसी का,

जो ये तकती है तुम्हारी राहों को..

ये तो बस आंखें हैं मेरी और आंखों का क्या है


क्या करोगे तुम जो भूल चूका है कोई खुद को,

जो उसे बस तुम याद हो..

वो तो बस मैं हूं और मेरा क्या है....
" खामोश चाहत में जो असर होता...
ये अल्फ़ाज़ बोल पडते..
सारी इबारत मिट जाती..
ये पन्ने रो पडते.."



Friday, January 19, 2007

MOMENTS OF LIFE....


LIFE IS NOTHING BUT STORY OF MOMENTS.... MOMENTS WE LIVED TOGETHER... MOMENTS WE SPENT APART... MOMENTS OF LOVE... MOENTS OF PAIN... MOMENTS WHEN WE LAUGHED MOMENTS WHEN WE CRIED...


ONE OF MY MOMENT IS THERE LYING WITH YOU ..AND ONE OF YOURS MOMENTS IS HERE KEPT WITH ME...


LETS COME TOGETHER AND MINGLE BOTH THE MOMENT IN EACH OTHER .. TO MAKE OUR LIVES ALIVE AGAIN... AND TO NAME IT OUR LIFE...