Wednesday, August 1, 2007

हां वो एक वेश्या है...... और तुम????


तुम उसे 'वेश्या' कहते हो...



क्योंकि उसने बेची है..अपनी देह..



अलग-अलग लोगों के साथ..



हर बार संबंध बनाये हैं उसने...



उसे हक नहीं समाज में..रहने का..



सम्मानित कहलाने का..



वो अलग है..तुम्हारी बहू-बेटियों से..



क्योंकि वो जैसे जीती है...



वो जीवन नरक है...



वो जो करती है...



वो पाप है...



उसे भूखों मर जाना था...



खुद को मिटा देना था..



पर खुद को बेचना नहीं था..



है.. ना?



पर एक बात कहो..



उन्हें क्या कहोगे तुम....



जिनकी रातें गुजरती हैं..



रोज़ एक नयी देह के साथ..



जिनके घर में पत्नियां भी हैं..



और प्रेमिकायें भी...



जो बाप हैं बेटियों के..



और भाई भी हैं.. बहनों के..



पर फ़िर भी खरीदते हैं देह..



और अलग-अलग रंग तलाशते है..



क्या वो 'बाज़ारू' नहीं?????



सिर्फ़ इसलिये की...



उन्होंने 'देह' बेची नहीं..



खरीदी है.....???!!!!



Saturday, July 21, 2007

"बांझ कौन है ?"




शादी के दो वर्ष बीत गये....


और वो 'मां' नहीं बन पाई...


वंश को एक चिराग ना दे पाई....


आस-पड़ोस, नाते-रिश्तेदारों में....


कानाफ़ूसी,सुगबुगाहटें होने लगीं..


बांझ, निपूती, अपशकुनी जैसे..


अलंकारों से उसे नवाजा जाने लगा...


केवल ससुराल वालों ने ही नहीं...


अब तो 'सात जन्मों के साथी' ने भी...


उसे 'बांझ' कहना शुरु कर दिया था...


शब्दों की प्रताड़ना अब धीरे-धीरे...


शारीरिक यातना का रूप लेने लगी थी...


'एक बच्चा भी ना जन पाई' ये सवाल....


सबके होठों पर..और नज़रों में हिकारत...


सबकुछ उसकी आत्मा पर छ्प गया था...


पर 'वो' अब भी मौन साधे जी रही थी...


शायद यही मेरी नियति है..मान लिया था..


एक दिन पोते का मुंह देखने की लालसा में..


सास ने अपने बेटे की दूसरी शादी की बात की..


बाप बनने की ख्वाहिश में पति ने भी हामी भर दी..


सात जन्मों का साथ निभाने वाले ने...


तीन सालों में साथ छोड़ दिया था..और..


हुआ किसी और का सात जन्मों के लिये..


'वह' कब तक रहती अकेली निःसहाय...


उसने भी फ़िर से घर बसा लिया...


आज फ़िर दो और वर्ष बीत चुके हैं...


आज 'वह' एक बेटी की गौरवान्वित 'मां' है...


सुहागन, भागन जैसे अलंकार हैं....


और सुना है उसके पहले पति ने....


अपनी दूसरी बीवी को भी...


'बांझ' कहना शुरू कर दिया है....






Sunday, July 15, 2007

ढाई आखर मेरे प्रेम के सांवरे.....कब समझोगे तुम...




ढाई आखर मेरे प्रेम के सांवरे....कब समझोगे तुम...


समझ गयी ये दुनिया सगरी... पर कब समझोगे तुम....


तुम बिन मैं भयी जोगन...


कुछ रूक के.. कुछ थम के...


हर पल बरसे... मेरे नयन....


सब कहने लगे मुझे... दीवानी...


पर जाने कब.... कुछ कहोगे तुम....


ढाई आखर मेरे प्रेम के सांवरे.... कब समझोगे तुम....




हर पल निरखूं... मैं बाट तिहारी.....


इस गली में.... उस डगर पर.....


हर जगह ढूंढू.... मैं तेरे कदम....


पर नहीं मिली कहीं... कोई तेरी निशानी....


जाने कब मिलोगे.... मुझसे तुम.....


ढाई आखर मेरे प्रेम के सांवरे.... कब समझोगे तुम.....




गीत गाये कई तेरी प्रीत के....


अब निकले हैं सुर.. बस तेरी विरह के...


कब से पुकारे तुझे... इन सांसों की सरगम...


रीत गयी मेरी उमर... करके तोहे सुमिरन....


पर जाने कब.. सुनोगे मेरी तुम....


ढाई आखर मेरे प्रेम के सांवरे.... कब समझोगे तुम......

Saturday, July 7, 2007

तुम ठूंठ नहीं हो....


मत कहो स्वयं को ठूंठ तुम...

क्योंकि मैं जानती हूं....

तुम ठूंठ नहीं हो....

तुम भी एक छायादार....

घने पेड़ हो....

बस वक्त की कड़ी धूप...

और गरम हवाओं के थपेड़ों ने...

सुखा दिया तुम्हारी नमी को....

और तुमने अपने पत्ते गिरा दिये...

और बन गये तुम छायाविहीन...

रूकता नहीं अब कोई राही भी यहां...

रह गये ये तना... और टहनीयां...

पर देखो फ़िर मौसम बदला है....

हवा में नमी है.. ठंडक है...

बादल छाये हैं... आसमां पर...

और बारिश होने लगी है...

इस नमी को सोख लो...

अपनी जड़ों में....

बहने दो इसे अपने भीतर....

देखना तुम फ़िर से खिल उठोगे...

नयी कोंपलें.... नये पत्ते... नये फ़ूल...

देखना राही फ़िर से रूकेंगे....

और ये तना.... टहनीयां....

बनेगी साक्षी तुम्हारे बीते कल की...

कि तुम ठूंठ नहीं थे.....

Saturday, June 30, 2007

तुम्हारा आईना हूं मैं.....


तुम्हारा आईना हूं मैं...

मैं तुम्हें दिखाता हूं...

तुम्हारी असल पह्चान...

तुम्हारी शख्सियत....

केवल तुम्हारा चेहरा ही नहीं..

देख सकता हूं मैं...

तुम्हारी आंखों... और....

तुम्हारे दिल में छुपा सच...

पर तुम्हारी नज़रें....

कभी अपनी आंखों में...

देखती ही नहीं....

और ना अपने दिल की..

तरफ़ देखते हो तुम....


हर सुबह तुम मुझमें...

निहारते हो खुद को....

और देख कर मुझ को..

मुस्कुराते हो तुम....

और खुश होकर...

निकलते हो घर से...

अपने चेहरे पर....

कई चेहरे लगाये......

शाम को लौटते हो...

चेहरे उतारते हो...

और फ़िर एक बार...

देखते हो मुझे....

पर झुकी नज़रों से...

और हट जाते हो...

असल चेहरा...

तुम्हें पसंद नहीं आता..


सच कहता हूं...

जिस दिन....

तुम्हारी नज़रों ने....

मेरी आंखों में...

देख लिया...

उस दिन से मुझे...

देखना छोड़ दोगे...

और कहीं भूले से...

जो उतरे मेरे दिल में...

सच कहता हूं....

मुझे तोड़ ही दोगे....

Saturday, June 23, 2007

तुम मेरा नाम रख देना...मैं बस तुम्हारे लिये रहूंगी...


यूं अकेले तन्हा... क्यूं हो..

किसे ढूंढते हो आस-पास...

मैं बन के हमराह..

हर पल संग चलूंगी..

तुम मेरा नाम 'साथी' रख देना..

बस तुम्हारे लिये तो मैं हूं...

तुम्हारे लिये ही रहूंगी...


तुम्हारा उलझा-उलझा सा दिल...

रोज़ करता है कितने सवाल...

आज मैं दूंगी साथ...

हर सवाल का जवाब बनूंगी..

तुम मेरा नाम 'तमन्ना' रख देना..

बस तुम्हारे लिये तो मैं हूं..

तुम्हारे लिये ही रहूंगी...


ये सूनी-सूनी.. खाली आंखें तेरी...

जाने कहां खोया इनका विश्वास...

अब मैं जगाउंगी आस....

मैं इनमें बन के दीप जलूंगी..

तुम मेरा नाम 'रोशनी' रख देना..

बस तुम्हारे लिये तो मैं हूं...

तुम्हारे लिये ही रहूंगी...


क्यूं बुझा-बुझा सा मन तुम्हारा...

नहीं जगता इसमें कोई अरमान....

मैं तुम्हारे सूखे होठों पर...

बन के मुस्कान खिलूंगी...

तुम मेरा नाम 'खुशी' रख देना...

बस तुम्हारे लिये तो मैं हूं...

तुम्हारे लिये ही रहूंगी....


जाने कबसे हो निःशब्द....

हर पल बोझल कटता ही नहीं...

तुम्हारे इस रूके जीवन में...

मैं दिल बन कर धड़कूंगी...

तुम मेरा नाम 'जिंदगी' रख देना...

बस तुम्हारे लिये तो मैं हूं..

तुम्हारे लिये ही रहूंगी....


"आने दो मुझे जिंदगी मे...होने दो शामिल धड़कन में...

चलो कुछ दूर मेरे साथ.. थाम के मेरा हाथ...

देखना मैं हर बेनूर पल में... 'रंग ओ नूर' भर दूंगी.."


Sunday, June 17, 2007

जिंदगी कुछ तो बता तेरा सच क्या है...


हंसते-मुस्कुराते चेहरों की खुशी में...

अचानक आंखों से पानी छलक आना..

बंद लबों में दर्द की लकीर का खिंच जाना...

कोमल चेहरे का अचानक सख्त हो जाना....

सपनीली आंखों में लहू का उतर आना...

इन बदलते मौसमों का मतलब क्या है..

जिंदगी कुछ तो बता तेरा सच क्या है...


थामे हुये हथेली से झटक कर हाथ छुड़ा लेना..

खुले हाथों की मुट्ठीयां भिंच जाना...

मिलते दिलों के सफ़र में अचानक पलट कर..

सीने में धोखे का खंजर चुभो देना....

इन बेगाने-बिखरते रिश्तों का मतलब क्या है...

जिंदगी कुछ तो बता तेरा सच क्या है...


पहले रोज़ बन के हमराह, हमसफ़र सा मिलना..

फ़िर एक दिन बनकर गैर नजर घुमा लेना....

रोज एक नयी राहगुजर से गुजरना .....

फ़िर भी मंजिल का ना मिलना...

इन अनजानी राहों का मतलब क्या है..

जिंदगी कुछ तो बता तेरा सच क्या है...


दिन भर कामों में उलझे रहना....

तरक्की के दौड़ में भाग-भाग कर थक जाना..

फ़िर भी आंखों में रातों को नींद ना आना..

मन में सुकून का ना होना....

इस बेचैनी का मतलब क्या है...

जिंदगी कुछ तो बता तेरा सच क्या है...


रोज़ एक नयी तलाश में घर से निकलना..

भीड़ में खुद को ढूंढने की कोशिश करना..

फ़िर हताश हो घर को लौट पड़ना....

अपने ही घर में मुसाफ़िरों सा रहना....

इन तन्हा चारदीवारीयों का मतलब क्या है..

जिंदगी कुछ तो बता तेरा सच क्या है.....


"जिंदगी कुछ तो बता ये तुझे क्या हो गया.."