
तुम उसे 'वेश्या' कहते हो...
क्योंकि उसने बेची है..अपनी देह..
अलग-अलग लोगों के साथ..
हर बार संबंध बनाये हैं उसने...
उसे हक नहीं समाज में..रहने का..
सम्मानित कहलाने का..
वो अलग है..तुम्हारी बहू-बेटियों से..
क्योंकि वो जैसे जीती है...
वो जीवन नरक है...
वो जो करती है...
वो पाप है...
उसे भूखों मर जाना था...
खुद को मिटा देना था..
पर खुद को बेचना नहीं था..
है.. ना?
पर एक बात कहो..
उन्हें क्या कहोगे तुम....
जिनकी रातें गुजरती हैं..
रोज़ एक नयी देह के साथ..
जिनके घर में पत्नियां भी हैं..
और प्रेमिकायें भी...
जो बाप हैं बेटियों के..
और भाई भी हैं.. बहनों के..
पर फ़िर भी खरीदते हैं देह..
और अलग-अलग रंग तलाशते है..
क्या वो 'बाज़ारू' नहीं?????
सिर्फ़ इसलिये की...
उन्होंने 'देह' बेची नहीं..
खरीदी है.....???!!!!





