
ढाई आखर मेरे प्रेम के सांवरे....कब समझोगे तुम...
समझ गयी ये दुनिया सगरी... पर कब समझोगे तुम....
तुम बिन मैं भयी जोगन...
कुछ रूक के.. कुछ थम के...
हर पल बरसे... मेरे नयन....
सब कहने लगे मुझे... दीवानी...
पर जाने कब.... कुछ कहोगे तुम....
ढाई आखर मेरे प्रेम के सांवरे.... कब समझोगे तुम....
हर पल निरखूं... मैं बाट तिहारी.....
इस गली में.... उस डगर पर.....
हर जगह ढूंढू.... मैं तेरे कदम....
पर नहीं मिली कहीं... कोई तेरी निशानी....
जाने कब मिलोगे.... मुझसे तुम.....
ढाई आखर मेरे प्रेम के सांवरे.... कब समझोगे तुम.....
गीत गाये कई तेरी प्रीत के....
अब निकले हैं सुर.. बस तेरी विरह के...
कब से पुकारे तुझे... इन सांसों की सरगम...
रीत गयी मेरी उमर... करके तोहे सुमिरन....
पर जाने कब.. सुनोगे मेरी तुम....
ढाई आखर मेरे प्रेम के सांवरे.... कब समझोगे तुम......





