
सड़क पर चल रही..
वो पागल औरत...
दुर्भाग्य से जवान थी...
तन पर कपड़े...
कुछ कम थे उसके..
पर शर्म और समाज से...
वो अनजान थी...
अलग-अलग नज़रें ....
उसे कई भावों से..
देख रही थी....
कुछ को हुई वितृष्णा..
और उन्होनें...
घृणा से थूक दिया..
कुछ को शर्म आई..
और नज़रों को..
झुका लिया...
कुछ को दया आई..
पर किया कुछ नहीं..
उफ़! बेचारी... कहा..
और चेहरा घुमा लिया...
पर.....
कुछ आंखें अब भी....
उसी को घूर रही थी..
उसकी मलिन...
धूल-धूसरित देह में...
जाने क्या ढूंढ रही थी...
हा! ये कैसी कुण्ठित मानसिकता....
ये कैसी मानवता???...
एक दीन-हीन.. निर्बल..
असहाय... संग्या-हीन...
मानवी भी तुम्हें...
नज़र आती है...
महज एक देह..
बस एक भोग्या???!!!....
"कह्ते हो तुम उसे पागल.. उसे होश नहीं..
पर तुम चेतनावान मानव...
क्या किया तुमने....
किसे कहूं .. मैं पागल...
सोचती हूं.. किसे होश नहीं??!!"





