Saturday, June 9, 2007

वो पागल औरत.....




सड़क पर चल रही..


वो पागल औरत...


दुर्भाग्य से जवान थी...


तन पर कपड़े...


कुछ कम थे उसके..


पर शर्म और समाज से...


वो अनजान थी...




अलग-अलग नज़रें ....


उसे कई भावों से..


देख रही थी....


कुछ को हुई वितृष्णा..


और उन्होनें...


घृणा से थूक दिया..


कुछ को शर्म आई..


और नज़रों को..


झुका लिया...


कुछ को दया आई..


पर किया कुछ नहीं..


उफ़! बेचारी... कहा..


और चेहरा घुमा लिया...


पर.....


कुछ आंखें अब भी....


उसी को घूर रही थी..


उसकी मलिन...


धूल-धूसरित देह में...


जाने क्या ढूंढ रही थी...






हा! ये कैसी कुण्ठित मानसिकता....


ये कैसी मानवता???...


एक दीन-हीन.. निर्बल..


असहाय... संग्या-हीन...


मानवी भी तुम्हें...


नज़र आती है...


महज एक देह..


बस एक भोग्या???!!!....




"कह्ते हो तुम उसे पागल.. उसे होश नहीं..


पर तुम चेतनावान मानव...


क्या किया तुमने....


किसे कहूं .. मैं पागल...


सोचती हूं.. किसे होश नहीं??!!"


Sunday, June 3, 2007

तुम मेरे मन के गांव चले आना...


यूं तो दिल बन चुका है...

शहर पत्थरों का....

पर एक कच्ची नम मिट्टी की..

पगडंडी अब भी जाती है....

मन के भोले-मासूम गांव को....

तुम उसी गीली पगडंडी पर..

कदम रख चले आना..मुझ तक..

और छोड़ते जाना...निशान..

अपने कदमों के...

मैं वहीं तुम्हारी राह तकूंगी...

तुमसे मिल...तुम्हारे संग चलूंगी...

तुम बस उसी राह चले आना..


एक कच्चा पुल भी है...

मेरे मन के गांव में...

तुम उस पुल पर...

बन के बादल बरस पड़ना...

और छोड़ जाना बारिश...

से भीगी मिट्टी की सोंधी महक..

मैं भी संग तुम्हारे भींग लूंगी..

तुम बस उसी राह चले आना...


एक छोटी बगिया भी है..

मेरे मन के गांव में..

उस बगिया में...

तुम पूरवा का झोंका बन आना...

बिखेर जाना फ़ूलों की महक....

मैं हवा के संग तुम्हें छू लूंगी....

तुम बस उसी राह चले आना...


"आओगे ना.. मेरे मन के गांव..

कच्ची सड़क पर पैर धरे...

मिलने मुझसे मेरे परदेसी सजन..

मैं तुम्हें उसी पार मिलूंगी..

तुम बस उसी राह चले आना.."

Friday, May 25, 2007

एक नदी है वो.....


एक नदी है वो...
बहती अविरल..
ढूंढती अपनी दिशायें खुद...
चुन के अपनी राह..बह्ती चंचल..
सुनो इसकी कल-कल...
कितनी मृदु, निर्मल, निश्छल..
देखो इसके सौंदर्य को..
जाने कितनी शंख-सीपियां..
जाने कैसे चिकने पत्थर..
चमकीली महीन नर्म रेत..
सब कुछ कितना सुंदर..
बह्ती जाती है..आतुर..
मिलने सागर को..व्याकुल...
सागर से मिल सागर सी..
हो जायेगी विस्तृत...
देखो कैसी बहती अल्ह्ड़..
शीतल जल.. कल-कल..

Sunday, May 20, 2007

सांवरे!.. कहां हो तुम..


बढता जाता है तन्हाई का एह्सास..

नहीं कोई हमराह मेरे साथ...

बस एक तेरी दिल को आस..

सांवरे!.. कहां हो तुम...


छुटता जाता है..रिश्तों का साथ..

नहीं बढाता कोई..अपना हाथ...

बस एक तेरी नज़रों को प्यास..

सांवरे!... कहां हो तुम.....


दिखाई देती है .. हर खुशी भी उदास..

रूकी-रूकी सी आती है हर सांस..

बस एक तेरी धड़कनों को तलाश..

मेरे श्याम-सांवरे!.. कहां हो तुम..

Monday, May 14, 2007

मैं... एक नाकाम कोशिश...


मेरा मन...

एक सीला.. अंधेरा कमरा...

जिसमें सन्नाटा.. पसरा हो..


मेरे सपने...

उस अंधेरे में..एक उदास..

रोशनी की लकीर से...


मेरी धड़कन...

कमरे में गुजरती... हवा की..

सरसराहट सी... सहमी हुई..


मेरे अह्सास...

उस अंधियारे में..

खो चुके उजालों से...


और तुम...

अचानक उतर आई.. सपनीले..

रंगों की धूप सरीखे...


और मैं....

उस धूप को...मुट्ठी में..

बंद करने की..

एक नाकाम कोशिश...

Monday, May 7, 2007

बहाव जिंदगी का......




कितने अजीब मोड़ों से गुजरी है जिंदगी...


जाने कौन है हमराह मेरा..


जाने कौन मेरा साथी...


जब भी जो भी मिला....


कुछ अपना सा ही लगा....


दिल के करीब कोई सपना सा लगा...


हर बार मुझे कोई.....


एक नया नाम देता गया..


एक नये बंधन में.....


मेरा वजूद डुबोता गया...


राह में खड़े उस पेड़ की तरह....


कुछ देर यहां ठहरना सभी का....


मेरी परछाईयों में....


सबको सुकून ही मिला....


ढलते दिन के साथ...


जो ढला मेरा साया...


मुझे छोड़ कर....


वो आगे बढता गया.....


और बढते अंधेरे में....


एक नयी आग जला गया....


जली आग ने राह को...


और भी रोशन कर दिया....


खुद को लुटा मेरा मन...


तन्हाई की तपिश सहता रहा....






पर अब चाह्ती हूं बस....


अब ये आग बुझ जाये.....


कोई तो बादल बन....


मुझ पर भी बरस जाये.....


इतनी हो बारिश....


भीग जाये मेरा तन-मन...


एक हो जाये जल-थल...


एक से ही ये धरती-गगन...


मैं भी डूब जाउं....


लेके किसी को संग....


बस अब ये जिंदगी....


किसी मोड़ पर ठहर जाये.....

Friday, April 13, 2007

शायद तुमने घर बदल लिया है....




पहले जब भी मैं तुम्हें...अपने घर के आंगने से...


पुकारा करती थी.. तुम सुन लिया करते थे...


कई बार छ्त की मुंडेर से...


या अपने कमरे की खिड़की से....


मेरे आंगन में झांका करते थे तुम....


और मैं आंगने में लगे नीम से....


बंधे झूले पर बैठी तुम्हें..


चुप के से देखती थी...


कई बार तुम चोरी -चोरी भी...


देखा करते थे मुझे...


जब मैं एक पैर पर खेल रही होती थी...


या बातें कर रही होती गुड़ियों संग..


या नाच रही होती दादी के गीत पर...


तुम्हें झांकता देख मैं शरमा कर..


अंदर दौड़ जाया करती थी..


तुम्हारा वो छत पर टहलने आना...


और मैं बाल सुखा रही होती थी...


और कभी कोई किताब हाथ में लिये..


यूं ही घूमना और मुझे देखना..


कई बार हम अपनी-अपनी छ्तों से..


शाम के सूरज को साथ डूबता हुआ देखते....




पर अब तुम कहीं नहीं दिखते...


ना छ्त पर..ना खिड़की से झांकते...


मेरी कोई आवाज़ तुम तक नहीं पहुंचती...


कई बार मैं आहट होते ही दौड़ कर आती हूं...


की शायद तुम आये हो...
पर तुम कहीं नहीं होते..


फिर एक दिन मैने तुम्हें चिट्ठी लिखी...


तुम्हारी कोई खबर तो मिले...


पर आज वो भी लौट आई है..


लिखा है पता गलत था...


शायद तुमने घर बदल लिया है...